एक बुक जर्नल: खून का रिश्ता - अनिल मोहन

Monday, August 20, 2018

खून का रिश्ता - अनिल मोहन

रेटिंग: 3/5
उपन्यास 12 अगस्त, 2018 से 15 अगस्त, 2018 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक 
पृष्ठ संख्या : 255
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स 


पहला वाक्य:
तेज गति से कार चलाते हुए साठ वर्षीय कृष्णलाल पाहवा ने मोड़ काटते हुये कार का स्टेयरिंग पूरा घुमा दिया। 

कृष्णलाल पाहवा शहर के इज्जत व्यापारी थे। शहर के नामी रईसों में उनका नाम शुमार होता था। उनका एक हँसता खेलता परिवार था जिसमें उनकी पत्नी शीला, बेटे सुरेन्द्र और विमल और बेटी रजनी शामिल थे। लेकिन फिर उनके ऊपर एक विपत्ति सी टूट पड़ी।उनकी बहु चित्रा , जिसका देहांत छः महीने पहले हो चुका था, अब वापस आकर उन सबको परेशान कर रही थी। चित्रा की आत्मा ने उनके पूरे परिवार को खौफज़दा कर दिया था। मरकर भी कोई जिंदा हो सकता है? ये बात उनका दिमाग नहीं मनाता था लेकिन आँखों के आगे दिखती चित्रा की आत्मा दिमाग को झुठला रही थी। 

आखिर क्या सचमुच चित्रा की आत्मा वापस आ गई थी? क्यों वह  आत्मा इस परिवार के पीछे पड़ी थी ?

कहते हैं जब परेशानियाँ आती हैं तो एक साथ ही आती हैं। जहाँ पाहवा परिवार चित्रा की आत्मा से बेजार था, वहीं दूसरी और एक और शख्स था जो इस परिवार के खिलाफ जाल बुन रहा था। उसने ऐसे पासे फेंके थे कि पूरा खानदान उसके चपेट में आ चुका था। यह शख्स रंजन ओबेरॉय था और इसने पाहवा खानदान को बर्बाद करने का बीड़ा उठाया था। 

आखिर कौन था रंजन ओबेरॉय? क्यों वो पाहवा परिवार के पीछे पडा था?

क्या चित्रा के भूत और रंजन के बीच में कुछ सम्बन्ध था? 

क्या पाहवा खानदान इन मुश्किल हालातों  के थपेड़ों को सह सका?

आखिर इन सब घटनाओं का क्या नतीजा निकला?

ऐसे ही अनगिनत प्रश्नों के उत्तर तो आपको इस उपन्यास को पढ़ने के पश्चात ही मिलेंगे।

मुख्य किरदार:
कृष्णलाल पाहवा - शहर का एक जाना माना व्यापारी
सुरेन्द्र पाहवा - कृष्णलाल का बड़ा लड़का
विमल पाहवा - कृष्णलाल  पहावा का छोटा लड़का
रजनी - कृष्णलाल पाहवा की बेटी
शीला - कृष्णलाल पाहवा की पत्नी
मेहरचंद - शीला का दूर का भाई जो पाहवा खानदान के साथ रहता था
चित्रा - पाहवा खानदान की बड़ी बहु जिसकी मृत्यु छः महीने पहले हुई थी
मंगतराम - पाहवा खानदान का नौकर
राजेन्द्र अवस्थी - रजनी का बॉय फ्रेंड
कोमल - सुरेन्द्र के कोमल से रिश्ते थे
अनीता - कोमल की दोस्त
वन्दना - एक लड़की जिसकी जान विमल ने बचाई थी
बंसी और सरला - वन्दना के माँ बाप
रंजन ओबेरॉय - एक व्यक्ति जो पाहवा खानदान को बर्बाद करना चाहता था
मुकुन्दलाल - एक पुलिस इंस्पेक्टर
बद्रीनाथ खन्ना - पुलिस कमीश्नर
डॉक्टर राम प्रासाद - कृष्णलाल पाहवा का दोस्त
चूनीलाल त्रिपाठी - सी बी आई का ऑफिसर
भगवानदास ठक्कर - चूनीलाल का चीफ

हाल फिलहाल में  अनिल मोहन जी का उपन्यास 'खून का रिश्ता' पढ़ना खत्म किया। यह उपन्यास अनिल जी के शुरुआती उपन्यासों में से एक है और कुछ समय पहले ही रवि पॉकेट बुक्स द्वारा दोबारा से प्रकाशित किया गया है। मैं एक ट्रिप से वापस आ रहा था तो मेरी नज़र इस पर पढ़ी और मैंने इसे खरीद कर पढ़ने की सोची। उपन्यास की शुरुआत में प्रकाशक  का वक्तव्य है जिसमें उन्होंने इसे सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में रखा है।
लेकिन मेरी नज़र में यह उपन्यास एक पठनीय थ्रिलर है।

उपन्यास एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसके ऊपर विपत्तियों का पहाड़ सा टूट पड़ता है। एक तरफ तो उनकी छः महीने पहले स्वर्गवासी हुई बहु की आत्मा परिवार वालों को तंग करने लगती है और दूसरी तरफ एक रहस्यमय शख्स परिवार के सदस्यों से बदला लेने के लिए उनके खिलाफ जाल बुनता दिखता है।

किताब शुरू से ही पाठको को बाँध कर रखती है। मुझे हॉरर वैसे भी पसंद है तो इस उपन्यास में आत्मा का होना मेरे लिए पृष्ठों को पलटने के लिए काफी थी। इसके इलावा एक रहस्यमय साजिश का साथ साथ चलते जाना सोने पर सुहागा था। कहानी इन दोनों पहलुओं को साथ लेकर चलती है। इसी कारण उपन्यास में रोमांच बरकरार रहता है।  उपन्यास का कथानक ऐसा है कि पाठक के रूप में मुझे कहीं भी बोरियत का एहसास नहीं हुआ। जैसे जैसे उपन्यास आगे बढ़ता गया वैसे वैसे रहस्यों से परदे उठते रहे और पाठक पढ़ने को विवश सा हो जाता है।

उपन्यास के किरदार कहानी के हिसाब से फिट बैठते हैं। समाज में कैसे तथाकथित इज्जतदार लोगों के चेहरे पर एक नकाब रहता है। वो नकाब जब उतरता है तो उसके भीतर से कैसे विकृत चेहरे निकलते हैं यह  इधर पता लगता है। लेकिन सब ऐसे होते हैं यह भी सच नहीं है। जैसे उपन्यास में विमल है जो अमीर तो है लेकिन फिर भी नैतिक है।

उपन्यास में  चूनीलाल त्रिपाठी का अंदाज मुझे काफी पसंद आया। उसके हाव भाव  और काम करने का तरीका रोचक था। उसे लेकर अगर कोई और कहानी अनिल मोहन जी ने लिखी होगी तो मैं वो भी पढ़ना चाहूँगा। इस किताब का नायक वही ही है।

उपन्यास में रंजन ओबेराय बदला ले रहा है। वैसे तो उसका कारण वाजिब है और मुझे उससे हमदर्दी है लेकिन एक जगह मुझे लगा था कि उसने अति कर दी थी। वो किसी किरदार  का कत्ल करता है और उस कत्ल में दूसरे बंदे को फंसा देता है। जो किरदार मरा मुझे लगा उसके साथ उसने अति की। हाँ, वो किरदार खराब था लेकिन फिर उस वक्त उसकी हालत ऐसी थी कि उसके मरने को मैं जस्टिफाई नही कर पाया और शायद मुझे उसके मरने का दुःख हुआ।

उपन्यास का मूल थीम बदला है। समाज के रसूखदार लोग कैसे पैसे और पहचान के  बल पर कानून को अपने हिसाब से ढालते है यह उपन्यास दिखाता है। ऐसा अक्सर होता है कि पैसे के बल पर न्याय करने वाले से ही  अन्याय करवाया जाता है। जब ऐसा होता है तो  फिर जिसके खिलाफ अन्याय होता है वह कानून हाथ में लेने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे अपराधियों के तरफ आपकी सहानुभूति तो होती है। पर अपराध चाहे जैसा भी हो उसका अंत बुरा ही होता है। बुरे काम का बुरा नतीजा ही होता है। उपन्यास खत्म होते होते यह  संदेश भी दे देता है। आज भी कुछ ऐसे अफसर हैं जो इमानदार है और अपने काम को निष्ठा से करते हैं। मुकुन्दलाल और चूनीलाल के रूप में ऐसे अफसरों से लेखक पाठकों को रूबरू करवाता है।

उपन्यास में वैसे तो कोई कमी नहीं है लेकिन इसमें ट्विस्ट नहीं है। यानी उपन्यास पढ़ते पढ़ते आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दोनों घटानाएं आपस में जुडी होंगी। रहस्यमय व्यक्ति के विषय में जब उपन्यास के बीच में एक बात पता चलती है तो आपको अंदाजा हो जाता है कि वो कौन था और ये सब क्यों कर रहा था? मुझे लगा था कि कोई तगड़ा ट्विस्ट उपन्यास के आखिर में आएगा लेकिन ऐसा नहीं होता है। उपन्यास में जब आत्मा का राज उजागर होता है तो उसका भी अंदाजा मुझे हो ही गया था।

अब उपन्यास के अंत की बात करूँ तो  जिस तरह से लेखक ने उपन्यास का अंत किया है वह  मुझे पसंद आया। इससे जुदा कोई अंत होता तो अपराध की जीत होती और वह पाठकों गलत संदेश देता।

उपन्यास के विषय में आखिर में यही कहूँगा कि उपन्यास रोमांचक है। कथानक पाठक को बांधे रखता है और तेजी से भागता है। बीच में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि जबरदस्ती खींचा गया है। टाइट कहानी के चलते  यह पाठक को बोर नहीं करता है । मुझे उपन्यास पसंद आया।

इस किताब में उपन्यास के आलावा सुनील 'गुजराती' जी की दो कहानियों को भी प्रकाशक ने प्रकाशित किया है। ये मुझे अच्छी पहल लगी। उपन्यास को बिना वजह खींचने के ऐसी कहानियाँ जोड़ी जानी चाहिए ताकि उपन्यास का कथानक बढ़ाने के चक्कर में लेखक को उसके कथानक की रफ़्तार से समझौता न करना पड़े।

बहरहाल प्रकाशित कहानियाँ निम्न हैं:

1) जीवन 3/5

पहला वाक्य: 
हॉलीवुड की प्रख्यात फिल्म सीरीज 'फाइनल डेस्टिनेशन' जब  भी कभी टीवी सक्री पर नज़र आती है, मैं उसे हर बार देखता हूँ।

कथावाचक को लगता है कि फाइनल डेस्टिनेशन फिल्म जीवन की तरह है और ये इसलिए भी है क्योंकि उसके जीवन की कहानी भी फिल्म के घटनाक्रम जैसा है। इसी बात को दर्शाने के लिए कथावाचक उस समय की कहानी बताता है जब उसके पिताजी की बीमारी का तार उसे मिला था और उसे अपनी पत्नी के साथ उनसे मिलने को जाना पड़ा था।

कथावाचक के पिताजी को क्या हुआ था? उधर जाकर उसके जीवन में क्या हुआ?

यह सब बातें  तो आपको कहानी पढ़ने  के बाद  ही पता चलेंगी।

फाइनल डेस्टिनेशन एक फ्लिम श्रृंखला है और उसके कुछ हिस्से मैंने देखे हैं। इसमें एक व्यक्ति को इस बात का पूर्वाभास हो जाता है कि उनकी मौत कैसे होगी और फिर पूरी फिल्म में वो अपनी मौत से बचने का प्रयास करते रहते हैं। वो उस वक्त तो बच जाते हैं लेकिन काल का ग्रास बनने से फिर भी नहीं बच पाते। पूरे फिल्म में किसी न किसी दुर्घटना की चपेट में वो आते हैं और अपनी नियति को प्राप्त होते है।

जब मैंने पढ़ा कि कथावाचक की ज़िन्दगी इस फिल्म की तरह है तो मुझे लगा इसमें भी कुछ फिल्म की तरह होगा। किसी को पूर्वाभास होता होगा और उस हिसाब से ज़िन्दगी आगे बढती होगी। लेकिन इस कहानी में पूर्वाभास नहीं है।

कहानी में बस ये दर्शाया गया है कि हमारी नियति के अनुसार ही चीजें होती हैं और ये हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दुखो से दुखी होकर जीवन काटें या उन्हें जीवन का हिस्सा मानकर खुशनुमा पलों को याद रखें। यही शायद कहानी का सार है जो लेखक ने दर्शाया है। कहानी प्रथम पुरुष में लिखी है। कहानी में फ़्लैश बेक का भी इस्तेमाल हुआ है और लेखक ने देश के विभाजन को भी कहानी में इस्तमाल किया है। उस वक्त लोगों को जो दर्द  भोगना पड़ा उसका भी मार्मिक चित्रण लेखक करने में सफल रहा है।

मुझे कहानी पसंद आई। कहानी पठनीय है।

2) अजब फसाना 3/5

पहला वाक्य:
नए साल का पहला दिन, यानी एक जनवरी।

श्री कुमार सार्वजनिक निर्माण विभाग के कार्यालय में ड्राफ्ट्समैंन(प्राविधिक) की पदवी पर थे। नये साल का दिन था और उनके दफ्तर का माहौल खुशनुमा था। इसी दिन उनके दफतर में एक युवक आया जिसने अपनी फाइल से जुडी समस्या उनके सामने रखी। श्री कुमार सज्जन थे और सराकरी काम कैसे  होता है इससे वाकिफ थे। उन्होंने युवक की मदद करने का वादा किया। लेकिन फिर हालात ऐसे हुए कि सारी बाज़ी ही पलट गई। श्री कुमार जी को अपनी नौकरी खतरे में महसूस होने लगी। युवक ने जिला अधिकारी को शिकायत की थी कि उससे रिश्वत मांगी गई है और श्री कुमार जी के अधिकारी ने मांगी है। यह सब कैसे हुआ इससे श्री कुमार जी हैरान थे?

आखिर यह अजब फसाना क्या था? श्री कुमार जी ये किस चक्कर में फंस गये थे? क्या सचमुच उन्होंने रिश्वत माँगी थी? इस अजब फसाने का अंत कैसे हुआ?

ये सब तो आपको इस कहानी को पढकर ही पता चलेगा।

कहते हैं कर  भला तो हो भला। इसी सूक्ति के चारो ओर इस कहानी को बुना गया है। श्री कुमार जी ने केवल मदद करनी चाहिये थी लेकिन अब उन्हें लेने के देने पड़ गये थे। कहानी रोचक और पठनीय है। कहानी में आगे क्या होगा ये जानने के लिए पाठक उत्सुक रहता है। इसके अलावा सरकारी ऑफिस किस तरह से काम करते हैं  ये भी इसमें दर्शाया गया है। रिश्वत सरकारी दफ्तरों में आम सी बात है। अपना काम करने के लिए भी उन्हें सामने वाले से पैसे की दरकार रहती है। अगर आपकी पहुँच है तो आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा लेकिन पहुँच नहीं है तो काम करवाना टेढ़ी खीर सा साबित होता है। ऐसा नहीं है हर सरकारी अफसर भ्रष्टाचारी है लेकिन ईमानदार अफसर को ढूँढना भूसे में सुई के समान तो है ही।

कहानी शुरुआत से अंत तक रोचकता बरकार रखती है। मुझे पसन्द आई।

प्रकाशक ने बताया है कि ये कहानियाँ सुनील गुजराती जी के कहानी संग्रह बेटी और नारी में प्रकाशित हैं। इसने मुझे थोड़ा हैरान किया। मुझे नहीं पता था कि रवि पॉकेट बुक्स ऐसी रचनाएँ भी प्रकाशित करता है। सुनील गुजराती जी के नाम से मैं पहली बार वाकिफ हुआ। अगर उन्होंने उपन्यास लिखे हैं तो वह भी मैं एक बार पढ़ना चाहूंगा। अगर आपको उनके उपन्यासों की जानकारी है तो कमेन्ट में मुझे जरूर बताईयेगा।

बहरहाल, इन दोनों कहानियों को पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूँ कि मैं इस संग्रह को पढ़ना चाहूँगा। अपने रेगुलर बुक स्टाल पर जाऊँगा और अगर मिलता है तो जरूर लूँगा। अभी के लिए तो कहूँगा कि दोनों कहानियाँ मुझे पसंद आई।

अगर आपने इस किताब को पढ़ा है तो इसमें छपी रचनाओ  के विषय में आपके क्या विचार है? कमेन्ट के माध्यम से आप मुझे अपने विचारों से जरूर अवगत करवाईयेगा। 

मैंने यह किताब ए एच   व्हीलर के एक स्टाल से  खरीदी थी। आपके निकट के ऐसे स्टाल में यह उपलब्ध होनी चाहिए। आप भी उधर से इसे खरीद सकते हैं। इसका ऑनलाइन लिंक तो मुझे मिला नहीं था। जब मिलेगा तो इधर अपडेट कर दूँगा।

अनिल मोहन जी के मैंने और भी उपन्यास पढ़े हैं। उन उपन्यासों के विषय में मेरी राय आप निम्न लिंक से प्राप्त कर सकते हैं:

2 comments:

  1. रोचक है | अनिल मोहन जी की देवराज चौहान और अर्जुन भारद्वाज सीरीज के नॉवेल के अलावा कोई नॉवेल नही पढ़ा | कभी सीरीज से इतर भी ट्राय करूँगा |

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी उनके श्रृंखला के इतर उपन्यास भी रोचक होते हैं। पढियेगा निराश नहीं होंगे।

      Delete

Disclaimer:

Vikas' Book Journal is a participant in the Amazon Services LLC Associates Program, an affiliate advertising program designed to provide a means for sites to earn advertising fees by advertising and linking to Amazon.com or amazon.in.

लोकप्रिय पोस्ट्स