अंधे की आँखें - एस सी बेदी

रेटिंग: 3/5
किताब 28 अगस्त 2018 से 30, अगस्त 2018 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 48
प्रकाशक: राजा बाल पॉकेट बुक्स

अंधे की आँखें


पहला वाक्य:
राजन चौंक उठा।

वह  कहने को एक अँधा भिखारी था लेकिन राजाओ सा जीवन जीता था। उसके विषय में मशहूर था कि वह उन लोगों से भी बेहतर देख सकता था जिनकी दोनों आँखें पूरी तरह से काम करती थी। उसका नाम टमाको था और फिलहाल वह अपने साथियों  के साथ भारत में मौजूद था।

जॉन बेलान एक अफ़्रीकी व्यवसायी था जो भारत में आया हुआ था। उसे इस अँधे की तलाश थी।

फिर जॉन बेलान एक इमारत में मरा हुआ पाया गया। उसके साथ एक स्थानीय अपराधी मदन की भी लाश मिली थी।

इन दोनों हत्याओं में उसी अँधे का हाथ दिखाई दे रहा था। और साथ में एक नाम सभी की जुबान पर था - रेड क्वीन।

आखिर कौन था यह अँधा? जॉन बेलान का कत्ल उसने क्यों किया? 
जॉन को उसकी जरूरत किस काम के लिए थी? आखिर यह रेड क्वीन क्या शह थी?

इन्ही सब प्रश्नों ने राजन-इकबाल के दिमाग को परेशान किया हुआ था।

क्या वह इन रहस्यों से पर्दा उठा पाये? इस मार्ग में उन्हें किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा और वो कसी तरह इससे जूझे?

मुख्य किरदार:
राजन - बाल सीक्रेट एजेंट
इकबाल - बाल सीक्रेट एजेंट
सलमा - बाल सीक्रेट एजेंट और इक़बाल की प्रेमिका
अँगूर - इकबाल का लँगूर
बलबीर सिंह - पुलिस इंस्पेक्टर
जान बेलान - एक अफ्रीकी व्यवसायी जिसकी लाश मिली थी
मदन - एक स्थानीय अपराधी जिसकी लाश जान बेलान के साथ मिली थी
आप्टे - मदन का दोस्त
जेनी - बेलान की बेटी
रेंडल - बेलान  का अफ्रकी नौकर
डेनियल - बेलान का सेक्रेटरी
टमाको - एक अफ़्रीकी अंधा जो इस वक्त भारत में था। लोग उसकी पूजा करते थे क्योंकि वह विलक्ष्ण शक्तियों का स्वामी था
काबी - टमाको की साथी
गाको - टमाको का साथी
जगाली - टमाको का साथी

अभी एस सी बेदी जी का लघु-उपन्यास  अंधे की आँखें पढ़ना खत्म किया। उपन्यास रोचक है इसमें कोई दो-राय नहीं है। उपन्यास शुरुआत से ही पाठको को बांधता है। इसकी संरचना इस तरह से की है पाठक शुरुआत में अपराध होते देख लेते हैं। लेकिन यह अपराध क्यों हुआ और हमारे नायक अपराधी को किस तरह से पकड़ेंगे यह कथानक पढ़ते हुए उन्हें पता चलता है। यानी इस उपन्यास में रहस्य यह नहीं है कि क़त्ल किसने किया लेकिन क्यों किया और वो कैसे पकड़ा जाएगा यह महत्वपूर्ण है।

उपन्यास के किरदार कहानी के हिसाब से बढ़िया गड़े गये हैं। उपन्यास का खलनायक टमाको है जो खूनी होते हुए भी उसूलों वाला है। अपने एक दुश्मन को खत्म करने के बाद वह उसके साथियों को जाने देता है क्योंकि उसे पता रहता है कि वे किराए के गुंडे थे और उनकी उससे कोई अदावत नहीं थी।
कमरे में मौत जैसी खामोशी छा गई थी। खामोशी तोड़ते हुए अँधा बोला - "इन तीनों को जाने दो।"
रिवॉल्वरधारी दरवाजे से हट गए। तीनो गिरते-पड़ते बाहर की तरफ भागे। (पृष्ठ 7 )

इससे पता चलता है कि वह बिना मतलब जान लेने के पक्ष में नहीं रहता है। वहीं एक बार वो अपने साथी को एक औरत को परेशान करने से रोकता है जिससे पता चलता है कि औरतों की वह इज्जत करता है।

"मुझे _ चाहिए , जिसके बाप को तूने यमलोक पहुँचाया है।"
टमाको तनकर खड़ा हो गया। उसका चेहरा पत्थर की तरह कठोर हो गया।
"गुलाम से कुछ गलती हुई टमाको?"
"टमाको धर्म का पुजारी है, धर्म के नियमों पर चलता है। किसी अबला पर अत्याचार करना टमाको पाप समझता है, चाहे वह दुश्मन की बेटी ही क्यों न हो।" वह गर्जा।  (पृष्ठ 29)

यही सब गुण उसे खलनायक के तौर पर रोचक बनाते हैं। मैं टमाको के विषय में अधिक जानकारी पाना चाहता था। वह अँधा कैसे हुआ? उसने अपराध की दुनिया में कदम क्यों रखा? ऐसे ही कई सवाल थे जिसके जवाब मैं पाना चाहता था। खैर, वो तो अब नहीं मिल सकते लेकिन इधर यह जरूर कहूँगा कि उसके ऊपर दिए गुणों के वजह से कहानी में जैसा उसका अंत होता है वह मुझे पसंद नहीं आया।

उपन्यास के बाकी किरदार कहानी के अनुरूप ही हैं। इकबाल के सीन हमेशा की तरह मजेदार हैं। सलमा और उसकी बातचीत भी मनोरंजक है। कई बार तो राजन भी इकबाल के साथ मजाक करते हुए दिखता है जो कि काफी कम होता है। उपन्यास में शोभा का जिक्र तो है लेकिन वह नहीं है तो उसकी कमी खलती है। उपन्यास में अँगूर नाम का एक लँगूर है। इस उपन्यास में पहली बार मैंने उसके विषय में पढ़ा। अन्य उपन्यासों में उसे देखना चाहूँगा।

उपन्यास में रोमांच भी है। अपराधियों और राजन इकबाल के बीच काफी आँख मिचोली होती है तो पाठक का मनोरंजन करेगी। कई बार हमारे नायकों को मुँह की खानी पड़ती है जिससे उपन्यास की रोचकता कायम रहती है और पाठक को आगे पढ़ते जाने पर मजबूर करती है।

उपन्यास में मुझे कमी लगी तो बस एक ही कि अक्सर नायक सही जगह पर इत्तेफाक से पहुँच जाते हैं। शुरुआत में इकबाल और सलमा उसी होटल में नाश्ता करते रहते हैं जहाँ बेलान और उसके साथी रुके थे।फिर बाद में इकबाल अपने अँगूर के साथ उसी क्लब में जाता है जहाँ टमाको और उसके साथी मौजूद  रहते हैं। यह सब ऐसे इत्तेफाक रहते हैं जो असल ज़िन्दगी में हो तो कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन अड़तालीस पृष्ठों के कथानक में होने से कथानक को थोड़ा कमजोर बनाते हैं। अगर इत्तेफाक की जगह कोई क्लू के सहारे वह लोग उधर पहुँचे होते तो ज्यादा सही रहता।

दूसरी चीज उपन्यास का आवरण है। उपन्यास का आवरण का कथानक से कोई लेना देना नहीं है। न जाने क्या सोचकर इसे लगाया गया? एक स्त्री है जो अंधी लग रही है लेकिन ऐसी कोई स्त्री कहानी में नहीं। फिर एक बच्चा और दूसरी स्त्री है जो भी कथानक से नदारद थी। ऐसे आवरण से बचना चाहिए था।

खैर, यह कमियाँ छोटी छोटी ही हैं जो उपन्यास की पठनीयता पर उतना असर नहीं डालती हैं। उपन्यास मनोरंजक  है और अगर राजन-इकबाल आपको पसंद है तो आपको यह पढ़ना चाहिए। उपन्यास मेरे लिए एक रोमांचकारी सफर था जिसने मेरा पूरा मनोरंजन किया। यह एक बाल उपन्यास है तो उसी तरह से मैंने इसे पढ़ा।उम्मीद है आपको भी पसंद आएगा।

उपन्यास आपने पढ़ा है तो अपनी राय से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।


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