Sunday, July 22, 2018

आदमी का ज़हर - श्रीलाल शुक्ल

रेटिंग: 3/5
उपन्यास जुलाई 6,2018 से जुलाई 8,2018 के बीच पढ़ा गया 

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक 
पृष्ठ संख्या : 144
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन 
आईएसबीएन : 9788171786657



पहला वाक्य:
खाना खत्म हो चुका था। 


हरीशचन्द्र और रूबी की शादी को सात साल हो चुके थे। और इन सात सालों में रूबी की खूबसूरती बढ़ी ही थी। हरीशचन्द्र को पता था कि लोगों को उसकी किस्मत से रश्क होता था लेकिन सच्चाई तो केवल वो ही जानता था। लोगों की नजरों में शायद रूबी और वो एक आदर्श पति पत्नी थे लेकिन हरीश को लगने लगा था कि ऐसा नहीं था।

उसे शक था कि उसकी बीवी का किसी और के साथ सम्बन्ध है। और फिर उसने जब अपनी पत्नी को अजितसिंह के साथ एक होटल के कमरे में देखा तो उसका अपने आपे से बाहर होना जायज ही था।

इसी आवेग में हरीश चन्द्र ने अजित सिंह पर गोली चलाई और उसके कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार हो गया।

यहाँ तक मामला सीधा साधा था। मामले में पेच  तब  पड़ा जब डॉक्टरी रिपोर्ट ने ये बताया कि गोली से तो अजित सिंह को बचा लिया था लेकिन फिर किसी ने उसे ज़हर देकर उसकी हत्या की थी।

पुलिस का मानना था कि ये काम रूबी का था। जबकि हरीश चन्द्र  मानता था कि रूबी भले जैसे भी हो वो ऐसा कुछ नहीं कर सकती है।

आखिर पुलिस इस नतीजे पर क्यों पहुँची? 

और अगर रूबी ने क़त्ल नहीं किया तो फिर अजित सिंह को ज़हर किसने दिया और क्यों?

रूबी को अगर इस केस में निर्दोष साबित होना था तो उसे इन सब सवालों के जवाबों को ढूँढना ही था और उसे पता था कि इस गुत्थी पूरे लखनऊ में केवल एक ही आदमी सुलझा सकता था। और वो था पत्रकार उमाकांत और इसीलिए रूबी ने उसे अपनी मदद को बुलाया।

क्या उमाकांत अजित की मौत का रहस्य उजागर कर पाया? 

आखिर किसने अजित की जान ली और क्यों? 

रूबी और अजित के बीच क्या रिश्ता था?

ऐसे ही सब प्रश्नों का उत्तर आपको इस उपन्यास को पढ़कर मिलेगा।

मुख्य किरदार:
हरीशचन्द्र - एक इलेक्ट्रिक सामान के शोरूम का मालिक 
रूबी - हरीशचन्द्र की पत्नी 
अजीतसिंह - एक पत्रकार जो जनक्रांति नामक साप्ताहिक अखबार निकालता था  
अशोक - एक सितार वादक जो स्थानीय कॉलेज में सितार सिखाता था 
शान्तिप्रकाश - मेयर के पद के उम्मीदवार 
दाताराम - हेड कांस्टेबल 
विद्यानाथ सिन्हा - सुपरिटेन्डेंट ऑफ़ पुलिस क्राइम ब्रांच 
जे ए सिद्दकी - सी आई डी का मशहूर इंस्पेक्टर 
डॉक्टर चटर्जी - सेंट्रल अस्पताल के सुपरिटेंडेंट 
महिपाल - अजितसिंह का नौकर 
रत्ना - अजितसिंह की चचेरी बहन और रूबी की दोस्त 
उमाकांत  - एक पत्रकार जिसे जासूसी करने का शौक भी था 
बादशाह - उमाकांत का साथी जो पहले एक ठग था लेकिन अब एक होटल चलाता था 
मिस लायल - अस्पताल की नर्स जहाँ अजीतसिंह को भर्ती किया गया था 
हरीसिंह - एक किसान जो मिस लायल को चाहने लगा था 
ज़रीना - एक युवती जिसको अजीतसिंह अपनी बहन मानता था
मलीना - एक उन्नीस वर्षीय नर्तकी जिसने काफी पहले रेलवे ट्रैक में जाकर अपनी जान दे दी थी 
जसवंत - शांतिप्रकाश की पार्टी का उम्मीदवार और एक बाहुबली 
भूपसिंह - कोतवाली के इंचार्ज 
वीणा गहलौत - पार्वती महिला आश्रम की लेडी सुप्रीटेंडेंट 

श्रीलाल शुक्ल जी को हिन्दी साहित्य में अगर जाना जाता है तो शायद राग दरबारी के लिए ही जाना जाता है। वो उनका एक कालजयी उपन्यास है ऐसा मैंने कई लोगों के द्वारा सुना है। सुना इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि अभी तक पढ़ा नहीं है। हाँ, इस साल पढ़ने का विचार जरूर है। लेकिन जब मैंने सुना कि उन्होंने जासूसी उपन्यास लिखा है तो मन में उसे पढ़ने की ललक जागना स्वाभाविक ही था। मुझे जासूसी साहित्य पढ़ना पसंद है। फिर उपन्यास के विषय में पढ़ना चालू किया तो लोगों से जाना कि ये उपन्यास बुरा उपन्यास है। एक पोस्ट पर तो किसी ने इसे श्रीलाल शुक्ल्र जी के लेखन कैरियर पर कलंक भी घोषित किया। ये सब पढ़कर मेरे मन में जो मुझे लगा था कि ये उपन्यास शायद औसत से नीचे ही होगा। इसलिए जब उपन्यास पढ़ना शुरू किया तो मुझे इससे ज्यादा उम्मीदें नहीं थी।

लेकिन अब चूँकि पढ़ चुका हूँ तो यहाँ ये ही कहूँगा कि उपन्यास एक औसत से अच्छा जासूसी उपन्यास है। ऐसा नहीं है कि इसमें कमी नहीं है लेकिन ये उतना बुरा नहीं है जितना कि लोग इसे बताते है। उपन्यास की शुरुआत ही रोमांच से होती है। जलन के आवेग में पति एक हत्या जैसा जघन्य अपराध करने की सोच लेता है। वो गोली भी चलाता है लेकिन मकतूल जब मरता है तो उसका कारण ज़ह होता है। यहीं से केस में पेंच पड़ता है और पाठक सोचने लगता है कि उसे जहर कैसे और क्यों दिया। जैसे जैसे कहानी आगे बढती है किरदारों के कई राज सामने आते हैं। कई संदिग्ध व्यक्ति भी कातिल होने के कैंडिडेट के रूप में भी खड़े होते है। ऐसे में उपन्यास का नायक अपने साथी बादशाह(जो कि अपने में एक रोचक किरदार है) के साथ मिलकर जिस तरह असली मुजरिम तक पहुँचता है वो एक रोचक घटनाक्रम है। कथानक पाठक को बांधे रखता है। उमाकांत के अलवा केस की छान बीन करता सी आई डी इंस्पेक्टर सिद्दकी ने भी मुझे प्रभावित किया।

 उपन्यास के सारे किरदार जीवंत है और कहानी यथार्थ के निकट लगती है। जब किरदारों के राज़ खुलते हैं तो आपको लगने लगता है कि ये कहानी तो किसी भी वक्त में हमारे आस पास घटित हो सकती है। किरदारों में मुझे बादशाह का किरदार बेहद पसंद आया। वो एक सजायाफ्ता ठग है जो कि अब शरीफ बन चुका है लेकिन चूँकि वो कभी अपराधिक गतिविधियों में लिप्त था तो उसे उस दुनिया कि अच्छी जानकरी है और इसी जानकारी से वो हमारे नायक उमाकांत की मदद करता है। उसके विषय में लेखक एक किस्सा सुनाता है कि कैसे वो अपनी मीठी मीठी बातों से किसी को भी ठगने की कुव्वत रखता था। ये किस्सा मुझे विशेष रूप से रोचक लगा।


उमाकांत भी अपने आप में एक करैक्टर है। वो लॉजिकल बन्दा है और अक्सर वैसे ही काम करता है। कई बार वो भावनाओं को इस तरह दरकिनार कर देता है कि सामने वाले को लगेगा कि वो कितना रूखा  है।

 उपन्यास में अंत तक कातिल का पता नहीं लगता है  और ये उपन्यास का प्लस पॉइंट है।

 उपन्यास में अगर कमी है तो खाली ये कि उपन्यास में जो कातिल के खिलाफ सबूत मिलता है और जिन सबूतों से उसे शिकंजे में फंसाया जाता है उनका होना मुझे जमा नहीं। वो लेखक की सुविधा के लिए रखे गये प्रतीत होते हैं। उनके विषय में खाली मैं इतना ही कहूँगा कि अगर मैं कोई अपराध करता हूँ और उसमें किसी चीज का इस्तमाल करता हूँ तो अपराध करने के बाद मैं शायद ही उसे अपने पास इतने दिनों तक रखूँगा। उसे जल्द से जल्द अपने से दूर कर दूँगा ताकि अगर कुछ हो भी तो मेरे पास वो चीजे न पाई जाएं और मैं फँस न पाऊँ। लेकिन इसमें कातिल ये काम नहीं करता है। यही मुझे इसका कमजोर पक्ष लगता है। जासूसी उपन्यास में ये बढ़ी बात होती है लेकिन चूँकि श्रीलाल शुक्ल जी का पहला जासूसी उपन्यास था और ज्यादातर उपन्यास रोचक है तो इसमे थोड़ी रियायत दी जा सकती है।

 मुझे उपन्यास पसंद आया। मुझे लगता है जिन्हें ये पसंद नही आया उन्होंने लेखक से कुछ और अपेक्षा की होगी क्योंकि जासूसी उपन्यास के तौर पर ये एक पठनीय उपन्यास तो है ही। जहाँ तक मेरी बात है न मैं लेखकों को खाँचे  में  बाँधना पसंद करता हूँ और न पाठकों को तो शायद ये भी कारण है कि हर तरह के साहित्य का आनन्द ले पाता हूँ।

 उपन्यास के ऊपर तो काफी बात हो गई। इस पोस्ट में मैं एक और चीज के ऊपर बात करना चाहता हूँ जिससे हिन्दी के कई लेखक और पाठक भी ग्रसित हैं। श्रीलाल शुक्ल भी कई हद तक थे। वो लिखते हैं:

"यह उपन्यास हिन्दी के उन असंख्य कथाप्रेमियों को सस्नेह समर्पित हैं जिनकी परिधि में दास्तावस्की से लेकर काफ्का और कामू तथा जैनेन्द्र से लेकर अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे विशिष्ट कृतिकारों का अस्तित्व नहीं है।"

ये कथन मुझे बहुत हद तक पूर्वाग्रह से भरा लगता है। ऐसे ही दूसरे कथन मैंने सुने हैं। जैसे जासूसी साहित्य एक सीढ़ी है जिसे पार करके आदमी विशिष्ट साहित्य की तरफ बढ़ता है। मुझे व्यक्तिगत  तौर पर यही लगता है दोनों तरह के साहित्य को पढ़ा जा सकता है और ज्यादातर पाठक(वो जो पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होते) दोनों तरह के साहित्य को चाव से पढ़ते हैं।  फर्क आता है सुलभता था। जासूसी साहित्य जन सुलभ होता है। चूँकि ये पोस्ट श्रीलाल शुक्ल जी के उपन्यास के ऊपर है और उन्ही के कथन से मैंने ये बात शुरू की थी तो इधर उन्ही के उपन्यास का उदाहरण देता हूँ। उनका 300 से ऊपर पृष्ठों का राग दरबारी ढाई सौ रूपये का है जबकि इतने ही पृष्ठों का राज भारती का उपन्यास मुझे  पच्चास  से साठ रूपये में मिल जाता है लुगदी में और अगर वाइट पेपर की बात हो तो वो सौ डेढ़ सौ में मिल जाता है और कभी सौ से कम में भी। मैंने कुछ दिनों पहले स्टेफेन किंग का स्लीपिंग ब्यूटीज़, जो कि साढ़े सात सौ पृष्ठों का उपन्यास है, को भी राग दरबारी के बराबर की कीमत पर खरीदा था। यहाँ पृष्ठ संख्या बताने का मेरा तात्पर्य ये है कि इतने पृष्ठों को इतने दाम में पाठक तक पहुंचाया जा सकता है। विशिष्ट साहित्य लिखने में भले ही ज्यादा मेहनत करनी पड़ती हो, लेकिन उसकी छपाई में जब इंक लगती है तो शायद उतनी ही लगती है जितना कि पल्प या दूसरे जन सुलभ साहित्य में लगती है। 

जिन विशिष्ट लेखको का नाम शुक्ल जी लेते हैं अगर उनका साहित्य जन सुलभ होता तो जरूर जासूसी पढ़ने  वाले भी उन्हें पढ़ते। मेरा ये सब लिखने का मंतव्य ये है कि चूँकि कोई पाठक एक तरह का उपन्यास पढ़ रहा है तो उसे नीची नज़रों से देखने के बजाय ये देखा जाए कि उसकी परिधि में विशिष्ट उपन्यास क्यों नहीं आ पा रहे हैं। कीमत को इसका सबसे बढ़ा कारण माना जाएगा। वरना प्रेम चंद को लोग चाव से पढ़ते हैं क्योंकि उनके उपन्यास जन सुलभ थे। मैंने प्रेमचन्द का पहला उपन्यास जो पढ़ा था वो वरदान था और वो उपन्यास लुगदी में था और बीस पच्चीस रूपये में वर्ष दो हजार ग्यारह बारह के करीब खरीदा था। तो कहने का तात्पर्य है कि केवल उपन्यास समर्पित करने से नहीं होगा। अगर उपन्यास अच्छा होगा तो पाठक पढेंगे ही लेकिन उसका जनसुलभ होना भी मायने रखता है। आप अभिजात्य वर्ग के लिए लिखकर दो सौ तीन सौ रूपये उपन्यास की कीमत रखकर रोयेंग कि उपन्यास नहीं पढ़ा जा रहा तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जो व्यक्ति महीने में दस हजार रूपये कमाता है वो अगर किताब पढ़ना चाहता भी है तो दो सौ रूपये की किताब खरीदना उसके लिए मुश्किल ही होगा जबकि वो अपनी ज़िन्दगी से ऐसे ही परेशान रहता है। वही किताब अगर उसे पचास साठ या सौ में भी मिल जाती है तो वो शायद उसे खरीद ले।  हिन्दी नहीं पढ़ी जा रही, पाठक घट रहे हैं इस बात के लिए न रोइए बस ये सोचिये कि आप लेखक या प्रकाशक के तौर पर ऐसा क्या कर रहे हैं कि पाठको को साहित्य आसानी से उपलब्ध हों। 

अंत में उपन्यास के विषय में इतना ही कहूँगा कि भले ही इसका अंत थोड़ा कमजोर लगा लेकिन उपन्यास के अधिकांश हिस्से ने मेरा मनोरंजन किया। लेखक की इस रचना को बिना पूर्वाग्रह और बिना अपेक्षा के पढ़ेंगे तो शायद आप भी इसका लुत्फ़ उठा सकें। मेरा तो इसे पढ़ते वक्त भरपूर मनोरंजन हुआ। आप एक रोचक जासूसी कथानक पढ़ना चाहते हैं तो एक बार इसे पढ़ सकते है। 


अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा? अपने विचारों से मुझे कमेंट के माध्यम से जरूर परिचित करवाईयेगा। 

अगर आपने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवाकर पढ़ सकते हैं:

6 comments:

  1. समीक्षा पढ़कर नावेल पढ़ने की जिज्ञासा प्रबल हो गयी है, जल्द ही पढता हूँ।

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    1. जी, पढ़कर जरूर बताइयेगा आपको कैसी लगी?

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  2. मुझे यह उपन्यास विद्यालय की तरफ से पढ़ने के लिए मिला है मैंने पढ़ा भी है बहुत अच्छा उपन्यास है आपसे विनती है कि हो सके तो थोड़ी इस उपन्यास की समालोचना आप मुझे लिख क्र भेज देते तो बड़ी कृपा होती मुझे लिखने में बहुत मदद हो जायेगी धन्यवाद

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    1. देखिये मैं साहीत्य का छात्र नहीं हूँ। मैं पेशे से एक वेब डेवलपर हूँ। यह ब्लॉग तो शौक के लिए चलाता हूँ। मैं इस काम में शायद आपकी मदद नहीं कर पाऊँगा। आपने पुस्कत पढ़ी है तो आप अपने विचार लिखकर उन्हें दें। अच्छा ही लिखेंगे। असाइनमेंट के लिए गुड लक।

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  3. कुछ महीने पहले fb पर एक पोस्ट पर राग दरबारी के साथ इस नॉवेल का भी जिक्र हुआ था पर सबकी और से नकारात्मक कमेंट थे पर आपकी समीक्षा पढ़कर एक बार पढ़ने की इच्छा हुई है | जल्द ही खरीदूंगा |

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    1. जी मुझे भी नकारात्मक टिप्पणी देखकर ऐसा ही लगा था लेकिन उपन्यास अच्छा है। एक बार पढ़ सकते हैं। जरूर पढ़िए।

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