Sunday, May 20, 2018

अगिया बैताल - परशुराम शर्मा

रेटिंग : 3.5/5
उपन्यास 04 मार्च 2018 से 06 मार्च 2018 के बीच पढ़ा गया
उपन्यास 18 मई 2018 से 20 मई 2018 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 156
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स
आईएसबीएन : 9788193566152




पहला वाक्य:
मैं उस दृश्य को देख रहा था।


रोहताश जब डॉक्टर बनकर विक्रमगंज आया तो उसे इस बात की ख़ुशी थी कि वो कम से कम अपने गाँव के निकट तो रहेगा। यही उसके लिए काफी था। उसके गाँव में उसके पिता थे और शायद एक सौतेली माँ भी लेकिन उनसे मिलने की इच्छा उसे नहीं हुई थी। फिर आने के छः महीने के बाद जब उसके पिता की मृत्यु का समाचार उसे मिला तो बेटे का फर्ज निभाने के लिए उसे अपने पिता के घर जाना ही पड़ा।

रोहताश एक डॉक्टर था और वैज्ञानिक सोच को ही तरजीह देता था। इसलिए जब उसे गाँव में फैला अंधविश्वास दिखता तो उन लोगों से उसे सहानुभूति भी होती और उनके अज्ञानता पूर्ण व्यवहार से खीज भी होती। ये उनकी अज्ञानता का ही नतीजा था कि उसके तांत्रिक पिता से पूरा इलाका घबराता था। उनका कभी पूरे इलाके में दबदबा हुआ करता था। लोग उनसे घबराते भी थे लेकिन फिर अपनी मन्नते लेकर उनके पास आते भी थे। विशेषकर जब उन लोगों को अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाना होता तो तांत्रिक साधुनाथ की याद उन्हें आती। लेकिन यह सब अब पुरानी बात थी। अब तो केवल उसे पिता का अंतिम संस्कार करना था। और ये काम निपटाकर वो अपनी साधारण सी ज़िन्दगी में वापस लौटना चाहता था।

लेकिन हम जो अक्सर सोचते हैं वो होता नहीं है। कहते हैं मैन प्रोपोसेस एंड गॉड डिस्पोसेस। ऐसा ही कुछ रोहताश के साथ हुआ।

अपने गाँव में दाखिल होते ही उसके साथ ऐसी परिस्थितियाँ बनी कि उसकी सारी वैज्ञानिक सोच धरी की धरी रह गई। ऐसी घटनाएं उसके साथ हुई कि जिस पिता से वो नफरत करता था, जिस पिता के काम से वो नफरत करता था उसे उसी काम की शरण में जाना पड़ा। उसे तांत्रिक साधना करनी पड़ी और अगिया बेताल साधना पड़ा।

आखिर कौन था ये अगिया बेताल?  रोहताश ने उसे किस प्रकार साधा? 

आखिर ऐसा क्या हुआ कि रोहताश को इस राह पर चलना पड़ा। इस राह पर चलने के लिए उसे क्या क्या कुकृत्य करने पड़े? 

और रोहताश का आखिरकार क्या हुआ?

इन्ही सब प्रश्नों का उत्तर आपको अगिया बेताल में मिलेगा।




मुख्य किरदार :
रोहताश - नायक। एक डॉक्टर जो पूरी ज़िन्दगी शहर में बिताने के बाद अपने गाँव के निकट विक्रमगंज में नियुक्त हुआ था
शम्भू - दो लठेतों में से एक लठेत जिसे लेकर रोहताश रात को अपने घर की ओर जा रहा था। शम्भु ने ही उसे अगिया बेताल के विषय में बताया था।
साधुनाथ - रोहताश के पिता जिनकी मृत्यु का समाचार पाकर रोहताश अपने गाँव जा रहा था। साधुनाथ एक तांत्रिक था जिससे पूरा इलाका घबराता था।
ठाकुर भानुप्रताप सिंह - सूरज गढ़ नामक रजवाड़े के मालिक। साधुनाथ और ठाकुर के बीच दुश्मनी बताई जाती थी
चन्द्रावती - साधुनाथ की तीसरी बीवी
ब्रह्मानन्द - रोहताश के ताऊ
भैरवप्रसाद - एक तांत्रिक जो ठाकुर भानुप्रसाद की मदद करने के लिए काला पहाड़ से बुलवाया गया था
अर्जुनदेव  सिंह - एक शिकारी
जसवंत सिंह - विक्रमगंज
काला मसान - एक शैतान जो भैरव प्रसाद का गुलाम था
शमशेर सिंह - ठाकुर भानूप्रताप का विश्वास पात्र आदमी
कल्लू मेहतर - गढ़ी में काम करने वाला एक मेहतर
कमला बाई - एक वैश्या जो सूरज गढ़ में रहती थी
लखनपाल सिंह - ठाकुर भानुप्रताप सिंह का दोस्त जिससे बाद में ठाकुर की अदावत हो गई थी
कृपाल भवानी - सूरजगढ़ के राजाओं का पहला तांत्रिक ,भैरव प्रसाद कृपाल भवानी का वंशज था
कुमार सिंहल - ठाकुर भानुप्रताप सिंह का बेटा
विनीता - एक विधवा
सेठ निरजंन दास - विनीता के पिता

परशुराम शर्मा जी का उपन्यास अगिया बेताल कल ही पढ़कर खत्म किया। यह दूसरी दफा है जब मैंने यह उपन्यास पढ़ा है। इससे पहले मार्च में पढ़ा था। उस वक्त सोचा था कि जब दूसरी बार पढूँगा तब ही इसके विषय में लिखूँ तो बेहतर रहेगा। ऐसा कई उपन्यासों के साथ कर चुका हूँ। क्यों करता हूँ पता नहीं।

खैर, आते हैं अगिया बेताल पर। अगिया बेताल मूलतः एक बदले की कहानी है। कहते हैं आदमी परिस्थितियों का पुतला होता है। वो कुछ भी निर्णय कर ले लेकिन जो  होना होता है वो उसके हाथ में नहीं होता अपितु बाहरी कारकों पे निर्भर करता है। यही इस कहानी के नायक के साथ होता है। वो तो केवल बेटे का फर्ज निभाने गाँव आया। न उसे अपने पिता से इतनी  मोहब्बत थी न उनका मोह। वो अपने पिता की असलियत जानता था और उनसे दूरी बनाए रखना चाहता था। लेकिन फिर वो उन्ही की दुनिया में खिंचता चले गया। ये हुआ केवल परिस्थितियों के चलते। मैंने अंग्रेजी में एक उक्ति पढ़ी थी कि ओफेन पीपल एंड अप बिकमिंग द वैरी थिंग दे हेट (often people end up becoming the very thing we hate) अर्थात कई बार आदमी आखिर में वही बन जाता है जिससे वो नफरत करता है।  हम किसी चीज के खिलाफ लड़ते हैं और फिर पता ही नहीं चलता कि बुराई से लड़ते लड़ते कब हम भी बुरे हो गये। ऐसे कई उदाहरण आपको अपने जीवन में मिलेंगे। रोहताश भी इसका एक उदाहरण ही है। वो अपनी पिता और उनके काम से नफरत करता था लेकिन वो उन्ही की तरह बना। वो किसी के खिलाफ खड़ा हुआ और अंत आते आते उससे भी ज्यादा खूँखार बन गया।  ऐसा कैसे होता है ये तो आपको उपन्यास पढकर ही पता चल सकेगा।

इधर ये बता दूँ कि उपन्यास में कई बार ऐसे लम्हे भी आते हैं जब मुझे रोहताश से नफरत भी हो गई थी। विशेषकर चन्द्रावती वाले प्रसंग के बाद से  तो रोहताश मुझे नायक लग ही नहीं रहा था। चंद्रावती की बात उठी है तो उसके हाल से मुझे काफी दुःख पहुँचा। मैं उपन्यास पढ़ते हुए यही सोच रहा था कि उसकी कहानी क्या रही होगी। उसने क्यों साधुनाथ से शादी करी होगी। मुझे कुछ भी कारण नहीं मिला। आखिर क्या मजबूरी रही होगी उसकी?आप क्या सोचते हैं?

अगिया बेताल ऐसे परिवेश की कहानी है जहाँ भूत प्रेत, बेताल जिन्न, काला जादू, तंत्र मन्त्र इत्यादि का अस्तित्व है। ये विषय रोचक है रोमांचक है और साथ ही खौफनाक भी है। जिस प्रक्रार तांत्रिक को ये शक्तियाँ मिलती है उसके वर्णन को पढ़ते हुए मैं खुद को तांत्रिक की जगह रखकर देख रहा था और उस वर्णन ने मेरे शरीर में सिहरन सी पैदा कर दी थी। उपन्यास में शुरू से लेकर आखिर तक  कई ऐसी घटनाएं होती हैं जो कथानक में रोमांच और डर का माहौल बरकरार रखती हैं।

उपन्यास के अंत की बात करूँ तो उपन्यास का अंत मुझे पसंद आया। इसके दो कारण थे।

1. जब हम किसी बदला प्रधान घटना को पढ़ते हैं तो हम वही तक कहानी देखते हैं जहाँ तक बदला समाप्त हो जाता है। ऐसी कहानियों को पढ़ते समय मेरे मन में ये प्रश्न हमेशा से उठता था कि बदला लेने के बाद उस व्यक्ति का क्या हुआ होगा। उसकी ज़िन्दगी का मकसद बदला लेना था। वो तो हो गया। अब आगे क्या? यही चीज रोहतास के मामले में भी मेरे मन में था। फिर कथानक जिस हिसाब से बढ़ रहा था उससे मेरे मन में नायक और खलनायक के बीच ज्यादा फर्क नहीं रह गया था। हाँ, ये जरूर था कि नायक कभी अच्छा रहा  था। इसलिए जिस तरह का अंत लेखक ने दिखाया वो मुझे पसंद आया। कहते हैं इट्स नेवर टू लेट टु मेंड थिंग्स (it's never too late to mend things) और इस कहानी में वो ही दृष्टिगोचर होता है। ये मुझे अच्छा लगा। दूसरा अवसर बहुत कम को मिलता है और सबसे अच्छी बात इस दूसरे अवसर के दौरान भी कई परालौकिक घटनाएं होती है जो रोमांच की कमी पैदा नहीं होने देती।

2. दूसरा कारण ये था कि उपन्यास के अंत में एक किरदार चन्द्र बेताल का जिक्र है। चन्द्र बेताल एक इनसान और बेताल के संसर्ग से उत्पन्न हुआ मनुष्य है। कहानी में ही बताते हैं कि उसके अन्दर कई ताकते होंगी।
इस बात से मेरे मन में ये चन्द्र बेताल के किस्से पढ़ने की उत्सुकता जागृत हुई है। उम्मीद है लेखक इस पर ध्यान देंगे और चन्द्र बेताल का लार्जर देन लाइफ कारनामा हमे पढ़ने  को मिलेगा।

उपन्यास जैसा मैंने पहले भी कहा कि मुझे पसंद आया। फिर भी चूँकि मैं लालची आदमी हूँ और कथानक से जितना हो सके उतना लेने की कोशिश करता हूँ। इसलिए मुझे लगता है  कि कथानक एक दो जगह और बढ़िया हो सकता था।

पहला प्रसंग तक का है जब रोहताश अगिया बेताल को साध रहा था। उसमें कुछ दृश्य डरवाने हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन शुरुआत में एक चीज बताई जाती है कि साधुराम, जो कि एक खूँखार और अनुभवी तांत्रिक था, वो भी बेताल को नहीं साध पाया था। ऐसे में मैंने उम्मीद की थी कि जब रोहताश बैताल साधने लगेगा तो उसके साथ हृदय कँपाने वाले घटनाक्रम घटित होंगे। ये घटनाक्रम घटित हुए भी लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये इतने भयावह नहीं लगे जितना कोई अनुभवी तांत्रिक नहीं झेल सकता था। मुझे लगता है घटनाक्रम को और डरावना बनाया जा सकता था और उनका वर्णन और विस्तृत तरीके से दिया जा सकता था। यदि ऐसा होता तो कहानी में रोमांच और हॉरर दोनों ही काफी मात्रा में बढ़ जाते।

दूसरा प्रसंग तब का है जब रोहताश भैरवप्रसाद के जादू को काटने के लिए उन हांडियों को लेने जाता है जिनमे भैरव ने जिन्न कैद किए रहते हैं। जब रोहताश  उन्हें निकालता रहता है तो उसे इस काम से रोकने के लिए वो माया का उपयोग करते हैं। रोहताश कहता भी है:

अब मैं इन बाईस जिन्नों को उठाकर ले जा रहा था। वे मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहे थे- उनके तीर तरकश खाली हो गए थे। हालाँकि उन्होंने मुझे भयभीत करने का पूरा प्रयास किया था।(पृष्ठ 75)

अब जिन प्रयासों की इधर बात हो रही है वो मुझे साधारण लगे। फिर चार हांडियों में से दो में ही कुछ दृश्यों का वर्णन है। ये भी एक आध लाइन में निपटा दिया है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि इधर वर्णन ज्यादा होता। चारो बार कुछ न कुछ खतरनाक होता तो कथानक और रोमांचक हो सकता था।

इसके इलावा उपन्यास में काफी वर्तनी की गलतियाँ थी जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उपन्यास का कवर मुझे पसंद आया। लेकिन तांत्रिक की तस्वीर कहानी के अनुरूप नहीं दिखी। कहानी के हिसाब से वर्णन कुछ इस तरीके का है:

मेरी दाढ़ी और बाल काफी बढ़ चुके थे, वो आपस में चिपककर रह गये थे। उनमें जुएँ भर गये थे। वस्त्रों पर चिल्लारों ने अड्डे बना लिए थे, पर मुझे इसकी जरा भी तकलीफ नहीं होती थी।

नाखून काफी नुकीले हो गये थे।

चन्द्रावती कहती थी कि अब मैं बहुत भयानक नजर आने लगा हूँ। (पृष्ठ 53)

तो अगर कवर में दिखने वाला व्यक्ति डिस्क्रिप्शन के अनुरूप होता तो मेरे ख्याल से कवर और बढ़िया और डरावना  बन सकता था। अभी कवर का रोहताश कुछ स्लीक(sleek) लग रहा है। उसके बाल बिखरे न लग कर काफी स्टाइलिश लग रहे हैं। कपड़े भी ठीक ठाक लग रहे हैं। ये तांत्रिक कम साधू ज्यादा लग रहा है। अगर ये तांत्रिक सरीखा लगता तो शायद कवर और अच्छा बनता। ये खाली मेरा व्यक्तिगत विचार है।

आखिर में मैं तो यही कहूँगा कि उपन्यास मुझे पसंद आया। मैं जिन भी उपन्यासों को पढता हूँ उन्हें श्रेणीबद्ध नहीं करता। इससे एक तो आप उपन्यास पढ़ने से पहले ही पूराग्रह से ग्रसित हो जाते हैं और फिर अपनी अपेक्षाओं से कहानी का मिलान करने लगते हैं। इसलिए भले ही प्रकाशक ने इस पर हॉरर थ्रिलर लिखा था लेकिन मैंने ये सोच कर नहीं पढ़ा।

हाँ, पढ़ने के बाद मैंने कह सकता हूँ कि  उपन्यास मुझे तो रोमांच से भरपूर लगा। ये रोमांच शुरू से लेकर आखिर तक बरकरार रहा।  कहानी में कई जगह मुझे चीजें भयावह भी लगी जिसने मुझे हॉरर का मजा दिया। यानी कुल मिलाकर मैंने इसे पढ़ना पूरी तरह से एन्जॉय किया।

मुझे उम्मीद है बैतालों,जिन्नों, मसानों की दुनिया के और भी किस्से परशुराम शर्मा जी के माध्यम से हमे पढ़ने को मिलेंगे। अगर आधुनिक पृष्ठभूमि में ये किस्से रचे जाए तो पढ़ने का आनन्द और बढ़ जाएगा।

अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये कैसा लगा?

अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।


अगर आप इस किताब को पढ़ना चाहता हैं तो आप इसे निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं:
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14 comments:

  1. बहुत बढिया समीक्षा करते हैं आप विकास जी

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    1. सर, ये समीक्षा नहीं है... बस किताब पढ़कर जो लगा वो लिख दिया.....शुक्रिया हौसलाफजाई के लिए

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  2. विकास नैनवाल जी मैं आपके रिव्यु से इत्तेफाक रखता हूँ की नावेल में अंत तक रोमांच बना रहा,नावेल में अघोरी जीवन और मान्यताओं का सटीक वर्णन है जो नावेल को वास्तविकता के करीब रखता है और साथ ही में बेताल को कहानी का हिस्सा बनाके उसे पूरी तरह कल्पित कथा का रूप दे दिया,और इस अद्भुत मिश्रण को रोचकता के साथ परोसने में लेखक कामयाब रहे।

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    1. शुक्रिया, अमित जी.... बहुत खूबसूरती से बयान किया आपने....

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  3. बहुत बढ़िया समीक्षा है।

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  4. बढियारिव्यु वैसे मैंने भी इसे काफी एन्जॉय किया है। 😊

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  5. बढ़िया लिखा विकास भाई ।

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    1. जी आभार। आपने अपना नाम भी लिखा होता तो अच्छा होता। खैर,आप आये और आपने टिप्पणी की इसके लिए मैं आपका शुक्रगुजार हूँ। ब्लॉग पर आते रहियेगा।

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  6. अच्छी समीक्षा है | मनोरंजक उपन्यास है मुझे भी पसंद आया था |

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    1. जी जानकर अच्छा लगा कि आपको भी पसंद आया। परशुराम शर्मा सर अच्छा लिखते हैं।

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  7. बढ़िया 👍कोशिश करूंगा पढ़ने की।

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