एक बुक जर्नल: सात तालों में बंद मौत - अमित खान

Monday, February 19, 2018

सात तालों में बंद मौत - अमित खान

रेटिंग: 2/5
किताब 13 फरवरी 2018 से लेकर 16 फरवरी 2018 के बीच पढ़ी

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 272
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स
श्रृंखला : कमांडर करण सक्सेना


पहला वाक्य:
वह रॉ(रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) का हेडक्वार्टर था - जहाँ इस समय कमांडर करण सक्सेना मौजूद था और प्रोजेक्टर रूम के विशाल परदे पर हिन्द महासागर का अत्यंत विहंगमकारी दृश्य देख रहा था।

हिन्द महासागर का एक इलाका कुछ समय से बहुत कुख्यात हो रखा था। उस इलाके में कुछ रहस्यमयी घट रहा था जिस करण उधर से होकर गुजरने वाले जहाज, नौकायें और स्टीमर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते थे। अब ऐसी ही एक जहाज दुबारा दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस बार फर्क ये था कि इस जहाज में भारत के जाने माने न्यूक्लियर साइंटिस्ट प्रोफेसर भट्ट भी सवार थे। और प्रोफेसर भट्ट के पास एक फ्लॉपी थी जिसमे उनके सारे परमाणु प्रयोगों की जानकारी थी।

आखिरी खबर मिलने तक कोस्ट गार्ड ने प्रोफेसर भट्ट को सकुशल तो निकाल लिया था लेकिन फिर ऐसा कुछ घटित हुआ कि कोस्ट गार्ड्स और प्रोफेसर भट्ट नामालूम किधर गायब हो गये। रह गयी थी तो बस एक आखिरी संपर्क कॉल जिसमे कोस्ट गार्ड्स ने मदद की गुहार लगाई थी और जिसका अन्त  उनकी हृदयविदारक चीखों से हुआ था। फिर  न उनकी लाशें मिली न ही स्टीमर के अवशेष।

आखिर क्यों हो रही थी इस जगह में इतनी दुर्घटनायें? प्रोफेसर भट्ट किधर गायब हो गये थे? क्या ये एक दुर्घटना था या एक सोची समझी चाल। क्या भारत के परमाणु रहस्य सुरक्षित थे?

ऐसे ही सवालों ने भारत सरकार को परेशान कर रखा था। इन्ही सवालों के जवाब ढूँढने के लिए करण सक्सेना को ये मिशन सौंपा गया।

क्या करण सक्सेना इस गुत्थी को सुलझा पाया?

मुख्य किरदार:
कमांडर करण सक्सेना - रॉ का एक एजेंट
गंगाधर महंत - रॉ के चीफ और कमांडर के बॉस
प्रोफेसर भट्ट - भारत के एक प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक
रचना मुख़र्जी - कमांडर की सहकर्मचारी
वरीस  अहमद उर्फ़ वरीस गड़बड़ - मिश्र का एक नागरिक
सुधाकर - एक इंजिनियर
चार्ल्स - एक पुरातत्ववेत्ता (अर्कियोलोजिस्ट)
जकिल - एक पेंटर और मूर्तिकार
मारकोस - फ्रांस की फ़ौज का एक कर्नल

सात तालों में बंद मौत को मैंने चाँद बावड़ी की यात्रा के समय जयपुर से खरीदा था।अमित खान जी की किताबों की बात करूँ तो ये संयोग ही है कि जब भी मेरा जयपुर जाना हुआ है तब ही मुझे उनकी एक किताब खरीदने का मौका मिला है। दिल्ली या गुड़गाँव में रहते हुए उनकी किताब शायद मुझे कभी ही दिखी हो।

सात तालो में बन्द मौत कमांडर करण सक्सेना श्रृंखला का उपन्यास है। उपन्यास की शुरुआत बेहतरीन ढंग से होती है।  एक मशहूर भारतीय वैज्ञानिक हिन्द महासागर में रहस्यमयी परिस्थितियों में गायब हो जाते हैं और कमांडर को उनको ढूँढने का मिशन दिया जाता है। जब शुरुआत में मैं इसे पढ़ रहा था तो मेरे दिमाग में अनेक सिनेरियो उभर रहे थे लेकिन सच बताऊँ तो  जो सिनेरियो अमित जी ने लिखा उसका मुझे दूर दूर तक कोई इल्म नहीं था। और उसने मुझे अच्छा सरप्राइज दिया। उपन्यास की शुरुआत में कमांडर कई भयावह अनुभवों से गुजरता है जो कि बड़े रोमांचक थे। इसके बाद वो एक जगह पहुँचता है और फिर पूरा उपन्यास उस जगह से बाहर निकलने  के ऊपर है। जैसे कि शीर्षक से पता चलता है कि वो लोग ऐसी जगह हैं जहाँ से निकलना सात तालों में बन्द जगह से निकलने से भी ज्यादा मुश्किल है।

उपन्यास का रोमांच इधर आकर थोड़ा कम हो जाता है। इधर अमित जी ने एक नयी दुनिया का निर्माण किया है और उसे खूबसूरती से दिखाया है लेकिन यहीं पे रोमांच और कहानी की गति थोड़ा कम हो जाती है। जो होना स्वाभाविक ही था। लेकिन उपन्यास में जो गड़बड़ शुरू हुई इधर से ही हुई।

कहानी में रूचि बनाये रखने के लिए ऐसे किरदार का होना जरूरी है जिसके साथ नायक का टकराव हो। ऐसा इधर भी होता दिखता है लेकिन वो टकराव अंत तक नहीं होता है।

उपन्यास के पृष्ठ 147  में ही करण को पता चल जाता है कि मारकोस से उनकी योजना को खतरा है। आगे चलकर ऐसा होता भी है। उस वक्त मेरे दिमाग में ये ख्याल आया था कि एक जासूस होने के नाते अगर मैं उधर होता तो सबसे पहले अपनी योजना पे मंडरा रहे मारकोस नाम के खतरे को खत्म करता। एक जासूस के लिए ये बड़ी बात नहीं है। उन्हें प्रैक्टिकल होना पड़ता है और कई बार क्रूर निर्णय लेने पड़ते हैं। फिर मारकोस कोई देवता आदमी भी नहीं था। इसलिए मेरे मन में ये ही प्रश्न था कि करण ने ऐसा क्यों नहीं सोचा। अगर वो समय रहते ऐसा कर देता तो उन्हें वो सब नहीं झेलना पड़ता जो आखिर में झेलना पड़ा। ऐसा नहीं था कि वो ऐसा कुछ नहीं कर सकता था। वो जिधर बन्द थे उधर झगड़े होना आम बात थी।

इसके इलावा एक और चीज मुझे खटकी थी। मारकोस ने अपने को कैद करने वालों के साथ एक समझौता किया था। अब सोचने वाली बात ये है कि ऐसा उसने कैसा किया? क्योंकि पृष्ठ १०० में बताया गया है कि :

'इन दोनों परतों या मंजिलों के बीच आने जाने का कोई मार्ग नहीं है।' 

और पृष्ठ 101 में बताया गया है:

'दरअसल जब वे किसी कैदी को यहाँ भेजना चाहते हैं... तो वह एक लम्बी-सी  रस्सी  में कैदी को बाँधकर ऊपर चिकनी चट्टान से नीचे लटका देते हैं और फिर रस्सी को कुछ इस तरह झटका देते हैं कि गाँठ खुद-ब-खुद खुल जाती है तथा कैदी धड़ाम से नीचे आकर गिरता है।'(पृष्ठ 101)

यानी कैद करने वाले कैदियों से मिलने कभी आते ही नहीं थे और आने का कोई औचित्य भी नहीं था। इसलिए  मारकोस का उनके पास सन्देश पहुँचाना मुझे तो कम से कम नामुमकिन लगता है। और लेखक ने भी इस विषय में कोई बात साफ़ नहीं करी है। बस ये कहा है कि ऐसा हुआ है।

हाँ, कहानी में ये बात जरूर रोमांच पैदा करती है क्योंकि हमारे नायकों की योजना का पता अगर दुश्मन को लग जाता है तो उससे टकराव होगा और ये टकराव देखने में मजा तो पाठक को आएगा ही। ऐसा टकराव होता भी है और उसे पढ़ने  में मजा भी आता है।

लेकिनं फिर उपन्यास का अंत जैसा हुआ उससे यही लगा कि कहानी एक जगह फंस गयी थी और उसे जल्द से जल्द खत्म करने की जरूरत थी। और इसलिए लेखक ने वो तरीका चुना।

उपन्यास की शुरुआत में एक फ्लॉपी का जिक्र था। कमांडर जब प्रोफेसर से मिलता है तो उस फ्लॉपी के विषय में पूछता है और प्रोफेसर कहते हैं:
'हाँ... वो कंप्यूटर फ्लॉपी भी मेरे पास है। भला मैं उसे अपने से अलग कैसे होने दे सकता था कमांडर!'
प्रोफेसर भट्ट ने अपने कपड़ों के अंदर बहुत छुपाकर रखी कंप्यूटर फ्लॉपी निकाली और उसे कमांडर करण सक्सेना को दिखाई। (पृष्ठ 111)

इधर कुछ प्रश्न मेरे मन में उठे। क्या जिस आदमी का सारा काम एक फ्लॉपी में होगा वो उसका बेकअप अपने पास नहीं रखेगा। ऐसा करना तो सबसे महत्पूर्ण है। तो प्रोफेसर को ऐसा करना चाहिए था। दूसरा प्रोफेसर का जहाज और उनको बचाने वाली स्टीम बोट जब डूबी तो प्रोफेसर गीले तो हुए होंगे और ऐसे में ये फ्लॉपी किसी काम की रही होगी और प्रोफेसर क्या इस बात से अवगत नहीं रहे होंगे? तीसरी बात ये थी कि इस वार्तालाप के बाद अंत तक न कभी इस फ्लॉपी का जिक्र आता है और न ही सुरक्षित करने की बात की जाती है जो अटपटी थी क्योंकि सारा मामला ही इस फ्लॉपी का था।

उपन्यास के बीच में कई अच्छे फाइट सीन्स है जो मनोरंजक हैं। इसके इलावा उपन्यास में वरीस अहमद यानी वरीस गड़बड़ का किरदार है जो हँसी दिलाता है। उसकी कहानी पढ़कर मैं खूब हँसा था और उपन्यास के बाकी किरदारों में से मेरा सबसे पसंदीदा वो ही था। उसकी ज़िन्दगी में घटी और गड़बड़ों के विषय में पढ़ना रोचक रहेगा।

आखिर में कमांडर के विषय में भी कुछ बात करना चाहूँगा। कमांडर रॉ का एक एजेंट है। उपन्यास के शुरुआत में वो रॉ के हेडक्वार्टर में ही जाता है लेकिन पृष्ठ 13 में उसे सीआईडी का जासूस बताया है। ये इतनी बड़ी बात नहीं है क्योंकि वो सीआईडी से ही रॉ में आया था। खैर, उसके विषय में एक बात मुझे खटकी थीं। वो ये कि एक जासूस का काम होता है कि वो किसी की नज़रों में न आये। वो भीड़ में अलग सा दिखेगा तो उसके मिशन का बट्टा ही बैठ जायेगा। अमेरिका एक ठंडा देश हैं और इसलिए उधर ओवरकोट और हैट का चलन है। क्योंकि सभी लोग इसे पहनते हैं तो नायक आसानी से  पहचान में नहीं आ पाता। लेकिन भारत में वही ओवरकोट और हैट उल्टा काम करेंगे। इधर चूँकि इनका चलन नहीं है इसलिए नायक सबकी नजरों में बना रहेगा। ऐसे में एक जासूस का ये परिधान पहनना व्यक्तिगत तौर पर मुझे तो नहीं जंचता। उसे तो ऐसा होना चाहिए कि वो आकर अपना काम कर जाए और लोगों को पता न चले। अब इस उपन्यास की ही बात लें तो इधर भी  कमांडर पनडुब्बी में ओवरकोट और हैट पहने घूमता है। अब इसका कोई औचित्य नहीं है। भले ही ये उसका ट्रेडमार्क क्यों न हो। तो मेरा सुझाव तो ये ही है कि कमांडर को ऐसे ट्रेडमार्क से मुक्त करना चाहिए ताकि वो यथार्थ के ज्यादा नजदीक लगे।

मेरे हिसाब से उपन्यास को  बार पढ़ा जा सकता है। उपन्यास में एक्शन सीन्स अच्छे लिखे हैं जो पढ़ने में रोमांच पैदा करते हैं। इसे पढ़कर मैं करण सक्सेना के और भी उपन्यास जरूर पढ़ना चाहूँगा। उम्मीद है जल्द ही कुछ और पढने को मिलेंगे।

अगर आपने उपन्यास पढ़ा है तो अपनी राय से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा।

अमित जी के दूसरे उपन्यासों के विषय में मेरी राय जानने के लिए आप निम्न लिंक पर जा सकते हैं:
अमित खान  

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