मौत का जादू - शुभानन्द

रेटिंग : 4/5
उपन्यास 24 दिसम्बर 2017 से 25 दिसम्बर 2017 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 44
आईएसबीएन : 9789382359852
श्रृंखला : राजन इकबाल रिबॉर्न #2



पहला वाक्य:
इकबाल ने नफ़ीस की कोठी के अंदर कदम रखा। 

सोहनपुर एक छोटा सा गाँव था जहाँ लियाकत खान का महल था। लियाकत खान नफीस खान के चाचा थे और बहुत दिनों से बीमार चल रहे थे। इक़बाल और नफीस इन्हीं को देखने सोहनपुर आये थे। लेकिन चाचा को उन्होंने महल से नादारद पाया था। उन्हें इस बात ने आश्चर्य में डाल दिया था कि जो चाचा इतने बीमार थे कि उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया था वो ही महल से गायब थे। घरेलू नौकर की माने तो वो उसी दिन कहीं चले गये थे। इकबाल और नफीस के पास इंतजार के आलावा और कोई चारा नहीं था।

कहते हैं इन्तजार का फल मीठा होता है लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं था। चाचा आये लेकिन उनके आने के साथ महल में ऐसी घटनायें होने लगी जिन्हें साधारण तो कहा ही नहीं जा सकता था। चाचा की माने तो ये किसी के काले जादू का नतीजा था। वहीं इकबाल को इसमें किसी के षड्यंत्र की बू आ रही थी। उसका जासूसी  दिमाग अलौकिक शक्तियों के अस्तित्व  पर विश्वास करने को तैयार नहीं था। लेकिन जो भी हो एक बात तो सबको पता थी कि इन घटनाओं से महल में मौजूद सब लोगों की जान पर खतरे में थी।

आखिर कौन था इन हरकतों के पीछे? क्या इकबाल बात की तह तक पहुँच सका? क्या चाचा का अंदाजा सही था? क्या महल के लोग इस मौत के जादू से जिन्दा बच सके? ये सब जानने के लिए तो आपको इस उपन्यास को ही पढ़ना पड़ेगा।

मुख्य किरदार:
इकबाल - सीक्रेट एजेंट
नफ़ीस खान - इकबाल का दोस्त। नफ़ीस पेशे से एक ठेकेदार था।
लियाकत खान - नफ़ीस के चाचा जिनका सोहनपुर में महल था।
ड्रेकुला - लियाकत खान का सेवक जिसकी जान उन्होंने बचपन में बचाई थी
दिव्या सेठ - दिव्या लियाकत खान के दोस्त की बेटी थी और पेशे से एक डॉक्टर थी। अपने पिता के कहने पर वो लियाकत का हाल चाल जानने आई थी
आंनद दास - लियाकत खान का बंगाली दोस्त। वो भूत प्रेत के मामले में ज्ञाता था और लियाकत ने उसे अपने महल में होने वाली गतिविधियों को जाँचने के लिए बुलाया था

मैंने इस उपन्यास को एक डाइजेस्ट में पढ़ा था। उस डाइजेस्ट में राजन इकबाल की वापसी और मौत का जादू एक  साथ प्रकाशित किये गये थे। दोनों उपन्यास के विषय में अगर एक ही पोस्ट में लिखता तो वो पोस्ट काफी लम्बी हो जाती तो इस कारण उस डाइजेस्ट के दोनों उपन्यासों  के विषय में मैंने अलग अलग पोस्ट लिखने का फैसला किया। राजन इकबाल की वापसी के विषय में मेरे विचार आप इधर पढ़ सकते हैं।

मौत का जादू राजन इकबाल रिबॉर्न श्रृंखला की दूसरा उपन्यास है। इस उपन्यास का कथानक पहले उपन्यास की घटनाओं के बाद घटित हो रहा होता है। इस उपन्यास की ख़ास बात ये है कि इसमें राजन, शोभा और सलमा नही है। ऐसे में मेरे विचार से इसे राजन इकबाल श्रृंखला में न ही रखते तो बेहतर होता।

राजन-इकबाल श्रृंखला के उपन्यासों को देखें तो उनमे अक्सर इकबाल का काम कॉमिक रिलीफ पैदा करना होता है। ज्यादातर महत्वपूर्ण काम  राजन ही करता है और ऐसे में इकबाल एक तरीके से सेकेंडरी किदरार सा प्रतीत होता है। ऐसे में मौत का जादू एक विशेष उपन्यास है जिसमे हमे इकबाल अपने पूरे जलाल पर दिखता है। इस कथानक में इकबाल महत्वपूर्ण है और कॉमिक रिलीफ के लिए उसके दोस्त नफीस को रखा है। हाँ, ऐसा नहीं है कि इकबाल इधर अपने करैक्टर से अलग काम करता हैं। मस्ती मजाक वो इधर भी खूब करता है लेकिन मस्ती करते हुए वो केस भी सोल्व कर सकता है ये इधर बखूबी दर्शाया गया है।

ऐसे उपन्यास और आने चाहिए विशेषकर शोभा और सलमा को लेकर तो आने ही चाहिए क्योंकि मुझे लगता है कि राजन इकबाल के चक्कर में इन दोनों महत्वपूर्ण किरदारों के ऊपर ज्यादा ध्यान लेखक(बेदी जी और शुभानन्द जी ) नहीं दे पाते हैं। ऐसे में एक श्रृंखला ऐसी हो जिसमे खाली वो केसेस हों जिन्हें ,राजन, इकबाल,शोभा और सलमा ने अकेले हल किया हो तो उन्हें पढ़कर मजा आ जायेगा। दोनों लेखको इस बिंदु पर ध्यान देना चाहिए।

उपन्यास में नफीस और इक़बाल के बीच के संवाद गुदगुदाते हैं। नफीस और दिव्या के बीच के प्रसंग भी काफी रोचक हैं। वहीं ड्रेकुला जैसे किरदार का होना पुरानी भूतिया फिल्मों की याद दिलाता है। इन फिल्मों में चौकीदार अक्सर दिखने में डरावना सा ही होता है भले ही वो खतरनाक न हो।  इधर भी ऐसा ही प्रतीत होता है।

मुझे हॉरर उपन्यास बेहद पंसद हैं और इस उपन्यास को हॉरर की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। इसमें तंत्र मंत्र और अलौकिक शक्तियाँ हैं जिनके साथ शायद पहली बार इकबाल का सामना होता है। एस सी बेदी जी  ने कभी इस दिशा में राजन इकबाल को लेकर कहानी नहीं लिखी थी तो शुभानन्द जी इस प्रयोग के लिए बधाई के पात्र हैं। यहाँ ये कहते हुए मुझे संकोच नहीं होगा कि ये प्रयोग सफल रहा है।

 इस उपन्यास से ये भी एहसास होता है कि शुभानन्द जी एक अच्छा हॉरर कथानक लिख सकते हैं। अगर वो इस विषय में सोचे और एक खालिस हॉरर उपन्यास लिखें तो उसे मैं जरूर पढ़ना चाहूँगा।

यह उपन्यास मुझे पसंद आया। इसमें एक्शन और रहस्य तो है ही लेकिन हॉरर एलिमेंटस की मौजूदगी इस पर चार चाँद लगा देती है।  अगर आपने पढ़ा नहीं है तो एक बार जरूर आपको इसे पढ़ना चाहिए।

अगर आपने मौत का जादू पढ़ी है तो आपको ये कैसी लगी? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर दीजियेगा। अगर आपने इस लघु उपन्यास को नहीं पढ़ा और पढना चाहते हैं तो इसे निम्न लिंक से प्राप्त कर सकते हैं:
पेपरबैक
किंडल

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6 Comments
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  1. गजब का नावेल पर,पेज कम होने के कारण,,,,अजब सा लगा भाई मुझे तो

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  2. सब कुछ तुरंत ही सिमट जाता है।

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    1. राजन इकबाल के कथानक एक तरह के होते हैं जिनमे ज्यादा विस्तृत वर्णन नहीं दिया होता। मेरे ख्याल से अगर इसे ज्यादा खींचा होता तो ये उबाऊ हो सकता था। उस हिसाब से जल्दी निपटाकर कथानक का कसाव बरकरार रखा है। एक बात मुझे ये भी ठीक लगी कि इसमें खलनायकों का पूरी तरह से खात्मा नहीं हुआ है बल्कि उनकी भविष्य में आने की संभावना को रखा गया है।

      आपने टिपण्णी की उसके लिए शुक्रिया बबलू भाई।आप पहली बार ब्लॉग पर आयें हैं, आते रहियेगा।

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  3. कब पढ़ा यह तो याद नही पर मनोरंजक लघु उपन्यास है |

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    1. जी सही कहा। राजन इकबाल रिबोर्न श्रृंखला के ज्यादातर उपन्यास मुझे पसंद आये हैं। अभी तीन पढ़ने रह गए हैं जल्द ही उन्हें पढ़ूँगा।

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