एक बुक जर्नल: काँपता शहर - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Monday, February 13, 2017

काँपता शहर - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग :  3/5
उपन्यास फरवरी 5,2017 से फरवरी 10,2017 के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबेक
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स
पृष्ठ संख्या : 318



पहला वाक्य :
एक मारुती एस्टीम औसत रफ़्तार से गोमतीपुर रोड पर बढ़ रही थी। 


रतन शाह, कुंदन सेठ और लतीफ़ कट्टे ने मिलकर उस अपराध  को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। अब तो उन्हें इससे हासिल  रकम के बंटने का इन्तजार था और फिर वो अपने हिस्से से अपने ख्वाब पूरे कर सकते थे।  लेकिन कुंदन सेठ को ये नहीं पता था कि रतन शाह ने कुछ और ही योजना बना रखी थी।

जब कुंदन को होश आया तो उसने अपने दोस्त के क़त्ल के जुर्म में अपने जो जेल में पाया। कुंदन सेठ यारमारी का शिकार हुआ था। न केवल रतन शाह बल्कि कुंदन की अपनी  महबूबा, रुपाली, ने भी  उसे धोखा दिया था। वो उस अपराध के लिए जेल की सलाखों के पीछे था जिसमे रतन शाह भी बराबर का हकदार था। अब वो जेल में था और रतन पैसों और उसकी महबूबा के साथ ऐश कर रहा था।

कुंदन सेठ  अब एक चीज चाहता था और वो था बदला। और उसे पता था कि उसकी तरफ से उसका बदला अगर कोई ले सकता था वो था श्यामराव पेठकर उर्फ़ सिकंदर। सिकंदर उसका दोस्त था। सिकंदर के दोस्त को कोई धोखा दे ये सिकंदर बर्दाश्त नहीं कर सकता था।

ये उसकी साख की बात थी और सिकंदर का राज स्थापित करने के लिए उसे उसकी साख बचानी जरूरी थी। क्या सिकंदर ने बदला लिया? आखिर कौन था सिकंदर? सिकंदर किधर राज करना चाहता था?

काँपता शहर सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का ३७ वाँ थ्रिलर उपन्यास है। थ्रिलर श्रेणी में उनके अक्सर उन उपन्यासों को रखा जाता है जो कि किसी श्रृंखला का हिस्सा नहीं होते हैं। यह उपन्यास जून १९९५ पहले मवाली के नाम से प्रकाशित हुआ था। उस वक्त इसकी छपाई से न लेखक खुश थे और न पाठक। इसलिए २००२ में इसे पाठक साहब ने दुबारा लिखा और मन मुताबिक़ इसे छपवाया। इस बार इसे काँपता शहर नाम से छापा गया। यह उपन्यास रवि वालों ने छापा है और ये अमेज़न पे मिलने लगा तो मैंने झट से मंगवा लिया था। हाँ,अब साईट  से यह उपन्यास गायब हो चुका है।

उपन्यास गुजरात की पृष्ठभूमि पे लिखा गया है। जैसा कि सब जानते हैं गुजरात एक ड्राई स्टेट है जहाँ शराब कानूनी तौर पर नहीं बिक सकती है। ऐसे में उधर शराब की तस्करी और उसकी चोरी छिपे बिक्री काफी होती है। ये एक ऐसा धंधा है जो उधर वर्षों से फल फूल रहा है। इसी चीज ने उधर शराब माफियाओं को जन्म दिया है।काँपता शहर उपन्यास एक ऐसे ही व्यक्ति श्यामराव पेठकर के इर्द गिर्द बुना गया है। श्यामराव उर्फ़ सिकंदर यारों का यार और दुश्मनों का दुश्मन है। वो एक गैंगस्टर है जिसे बिजनेसमैन कहलाना पसंद  है। वो शराब की तस्करी करता है और गुजरात में मुंबई के माफिक अंडरवर्ल्ड बनाने का सपना देखता है।  वो गुजरात पे एक छत्र राज चाहता है। पाठक की मुलाकात उससे तब होती है जब कुंदन सेठ नामक किरदार उससे अपने को धोखा दिया जाने का बदला लेने के लिए बुलाता है। सिकंदर इसके लिए तैयार होता है केवल इसलिए नहीं कि कुंदन उसका दोस्त था बल्कि इसलिए भी कि ऐसा करके वो अपनी साख स्थापित करना चाहता था। वो चाहता था कि कोई भी उससे जुड़े लोगों को छूने से पहले सोचे कि उनका अंजाम क्या हो सकता है।
वो अपनी चाहत को हकीकत में बदलने के लिए क्या कदम उठाता है ? इस राह में उसके आगे कितने रोड़े आते हैं और वो उनसे कैसे निजाद पाता है। इस राह में चलते हुए उसकी ज़िन्दगी कैसा रुख लेती है। यही इस उपन्यास का कथानक बनता है। अगर साधारण शब्दों में कहूँ तो उपन्यास सिकंदर की जीवनी है। 

सिकंदर का किरदार गुजरात के एक नामी बूटलेग्गेर अब्दुल लतीफ़ पर आधारित लगता है। जब उपन्यास पहली बार आया था तो उस वक्त लतीफ़ जिंदा था और जेल में था। (हाल में रिलीज़ फिल्म रईस भी उसी के जीवन पर आधारित थी।) उपन्यास पढ़ते वक्त जरूरी नहीं है कि सिकंदर आपको पंसद ही आये। वो गाली बहुत देता है। अपने दुश्मनों को मारने से पहले सोचता भी नहीं है लेकिन उसके अन्दर कुछ खूबी भी है। वो माल की तस्करी तो करता है लेकिन माल में मिलावट नहीं करता है। वो कड़क माल लोगों को देता है। वो दोस्तों के लिए कुछ भी करने को तैयार होता है लेकिन अगर उसे लग रहा है कि कोई उसे दोस्ती की आड़ में धोखा दे रहा है तो उसे मारने से पहले झिझकता भी नहीं है। कहने का मतलब है वो एक इंसान है जिसने यह रास्ता चुना है। उसे पता है इस रास्ते में उस क्या क्या करना पड़ सकता है और वो उसे करता है।  वह व्यवाहरिक आदमी है। उपन्यास पढ़ते हुए आपको अंग्रेजी की कहावत 'uneasy lies the head that wears the crown' चरित्राथ होते हुए भी दिखती है। 

 सिकंदर शुरू में प्रभावित करता है लेकिन बीच में आप उसके विषय में पढ़ते हुए सोचने लगते हैं कि एक अन्धविश्वासी होना कितना बड़ा सेट बेक हो सकता है। उपन्यास पढ़ते हुए कई बार आप सोचेंगे कि सिकंदर क्या बेवकूफियाँ कर रहा है लेकिन वो बेवकूफियाँ  उसे और ज्यादा वास्तविक किरदार बनाती हैं। 

 उपन्यास में ये बात मुझे अच्छी लगी  कि भले ही उपन्यास नॉयर (noir) है लेकिन इसमें सिकंदर का कहीं भी महिमामंडन नहीं किया गया है। और न ही उसे जरूरत से ज्यादा खराब दिखाया गया है। कई जगह वो सही लगता है और कई जगह गलत।  वो कभी शातिर अपराधी की काम करता है और कभी कभी गलतियाँ भी करता है।  अपराधियों को लेकर इस तरह  दृष्टिकोण मुझे पसंद आता है। वरना कई बार लेखक या तो अपराधी का महिमामंडन कर देते है या उसे बिलकुल शैतान करार कर देते हैं। जिससे वो व्यक्ति वास्तविक न रहकर मिथकीय हो जाता है।

उपन्यास में एक और किरदार जो मुझे पसंद आया वो मालती का किरदार था। मालती उपन्यास में एक आश्रिता की तरह आती है और फिर एक सशक्त महिला की तरह उभरती है। वो ऐसी किरदार है जो जोड़ तोड़ बिठाने में माहिर है और सबको अपने हिसाब से चला सकती है। मालती के इलावा छोटे दलवी का किरदार भी मुझे सही लगा।

मेरे हिसाब से उपन्यास एक बार पढ़ा जा सकता है। उपन्यास पठनीय है और बीच बीच  रोमांच की थोड़ी कमी होते हुए भी आप सिकन्दर के साथ क्या होगा ये देखने के लिए उपन्यास पढ़ते जाते हैं। 

उपन्यास आप डेली हंट नामक एप्प पर पढ़ सकते हैं। 

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