एक बुक जर्नल: पाँच पापी - सुरेन्द्र मोहन पाठक

Saturday, July 9, 2016

पाँच पापी - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : 3.5/5
उपन्यास २८ जून २०१६ से २ जुलाई २०१६  के बीच में पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : ई-बुक
प्रकाशक : डेली हंट
पहला प्रकाशन : १९८९

पहला वाक्य :
साधूराम होतचन्दानी के बंगले के ड्राइंगरूम के तमाम खिड़कियाँ दरवाजे बन्द थे।

साधूराम हतचन्दानी एक व्यापारी था जिसने नेपाल में रहकर काफी दौलत कमाई थी। इस दौलत का ज्यादातर हिस्सा उसने बेईमानी और धोखाधड़ी से कमाया था। पच्चास के उम्र के आसपास का होतचन्दानी अब अपना सारा कारोबार बेचकर और अचरा, जो कि एक बेहद खूबसूरत थाई महिला थी, के साथ वापस भारत जाना चाहता था। लेकिन उसकी ये इच्छा केवल इच्छा ही रह गयी जब किसी ने उसकी छाती में गोली दाग़ दी।
क़त्ल का शक पांच लोगों के ऊपर था। एक उसका बेटा मानक होतचन्दानी, जिसे साधूराम की कभी नहीं बनी, उसका दमान योगेश कृपलानी,जो कि बुरी तरह से कर्जे में डूबा हुआ था, उसकी जवान माशूका अचरा योसविचित( जो शायद पैसे के लिए ही उसके साथ थी), कैप्टेन विलययम मूंग विन( अचरा का ख़ास दोस्त जो उसका प्रेमी भी हो सकता था) और आखिरी में साधूराम का वकील मच्छेन्द्रनाथ राणा। 
 तो कौन था इनमे से कातिल और आखिर क्यों हुई थी साधूराम की हत्या?
पुकीस के इलावा विवेक जालान भी कातिल का पता लगाना चाहता था। क्योंकि पुलिस की निगाह में वो भी कातिल हो सकता था। और केस सॉल्व हुए बिना वो नेपाल से बाहर नहीं जा सकता था जो कि उसके लिए बहुत जरूरी था।
क्या वो इस गुत्थी को सुलझा पाया।
इनके इलावा एक और संदिग्ध आदमी था और वो था दामोदर खैतान, जो कि साधूराम से पचास लाख के हीरे खरीदने का इच्छुछुक था। लेकिन साधुराम की मौत के बाद जब जवाहरात भी चोरी हो गए तो वो अब उस चोर की तलाश में था जिसने उन्हें चुराया था। उसे लग रहा था कि वो जवाहारात उन पाँचों में से ही किसी के पास थे। तो क्या उसे वो जवाहरात मिले? आखिर उन जवाहरातों में ऐसा क्या था जो उन्हें खरीदने के लिए दामोदर इतना बेकरार  था?
सवाल कई हैं और जवाब उपन्यास के अंदर ही आपको मिलेंगे। 


सुरेंद्र मोहन पाठक जी के इस उपन्यास के विषय में अपनी राय दू तो यह उपन्यास मुझे बेहद पसंद आया। उपन्यास की शैली हु डन इट की है। अगर आप इस तरह ले उपन्यासों के शौक़ीन हैं तो आपको पता होगा कि इस तरह के  उपन्यासों में एक क़त्ल होता है और उसका संदेह एक से ज्यादा लोगों पर होता है। फिर उपन्यास का नायक उन लोगों  में से असली अपराधी को ढूँढता है। यह उपन्यास भी ऐसा ही है। इसमें हीरो के ऊपर भी पुलिस को कत्ल का शक होता है और अपने आप को बेगुनाह साबित करने उसे कातिल को ढूँढना होता है।  ऐसे उपन्यासों में अगर कमी होती है तो वो ये कि आप कातिल का पता और कत्ल क्यों हुआ लेखक के बताने से पहले ही लगा ले। लेकिन इस उपन्यास में ऐसा नही होता। खैर, मेरे साथ तो ऐसा नहीं हुआ। मुझे कातिल का पता अंत तक नहीं लगा। इस हिसाब  से  मेरे लिये ये एक अच्छा हु डन इट था और मैं इससे  संतुष्ट हूँ। 
उपन्यास में मुझे अगर कमी लगी तो वो ये कि उपन्यास का शीर्षक मुझे सही नहीं लगा। जिनके ऊपर मारने का शक था उनसे बड़ा पापी तो मरने वाला था।(ये स्पॉइलर नहीं है क्योंकि उपन्यास की शुरुआत में ही पाठकों को इसका अंदाजा हो जाता है।) और दूसरी बात अगर कत्ल करने वाले सस्पेक्ट्स  देखे जाएँ तो कहानी में एक वक्त ऐसा आता है कि वो पाँच से ज्यादा दिखते है । अब शीर्षक से खाली ये हुआ कि जो नये कैंडिडेट उभरे उनके विषय में मैंने पहले ही सोच लिया था कि चूंकि ये उन पाँचो में से नहीं है तो इन्होंने कत्ल किया भी नहीं हो सकता है। और अंत में ये बात सही भी निकली। अगर शीर्षक अलग होता तो ये बात मेरे मन में ये बात नहीं आ सकती थी। 
इसके इलावा एक और छोटी सी बात थी जो मुझे खली वो ये कि  उपन्यास का घटनाक्रम नेपाल में घटित होता है लेकिन उपन्यास पढ़ते वक्त इसका एहसास मुझे न हो सका। हाँ, किरदारों के नाम नेपाली जरूर थे लेकिन उपन्यास में ऐसे विवरण की कमी थी जिससे मुझे लगता कि मैं नेपाल में हूँ। पाठक साब के मुम्बई, दिल्ली और गोवा वाले उपन्यासों में बाकायदा आपको लगता है कि आप किरदारों के साथ उधर पहुँच गये है।
इन दो बातों के इलावा उपन्यास में ऐसा कुछ नहीं था जो कि मुझे कम लगा हो।
अंत में केवल इतना कहूँगा कि उपन्यास मुझे पसंद आया। यह एक अच्छा हु डन इट है जो आपको पूरा मज़ा देगा। अगर आप हु डन इट पढ़ते हैं तो आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए। अगर आपने उपन्यास पढ़ा है तो इसके विषय में अपनी राय ज़रूर दीजियेगा। और अगर नहीं पढ़ा है तो उपन्यास आप डेलीहंट एप्प से पढ़ सकते हैं। उपन्यास का लिंक :

2 comments:

  1. Dear Sir,

    I felt happy, if you give me books of - Surendra Mohan Pathak sir, on jachak.raju@gmail.com

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  2. मैं इन उपन्यासों को डेली हंट एप्प पे पढता हूँ। आप चाहें तो उसका इस्तमाल कर सकते हैं। पेपरबैक में इन उपन्यासों का मिलना बहुत मुश्किल है।

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