मुखबिर - अनिल मोहन

रेटिंग :2.5/5
उपन्यास २ जून,२०१६ से ४ जून,२०१६ के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 238 | प्रकाशक: राजा पॉकेट बुक्स | सीरीज: देवराज चौहान




पहला वाक्य:
टीनू नाम था उसका, पर हर कोई जानने वाला उसे स्मैकी कहता था। 

डकैती मास्टर देवराज चौहान के साथ ऐसा कम ही होता था कि उसने किसी डकैती की प्लानिंग की हो और उसमे वो असफल रहा हो। लेकिन इस बार ऐसा ही हुआ था। न केवल वो डकैती करने में असफल हुआ था बल्कि किसी ने उसी के प्लान को इस्तेमाल करके डकैती को अंजाम दिया था। और सबसे बड़ी हैरत की बात ये कि पुलिस का कहना था कि डकैती और सम्बंधित खून में देवराज चौहान का हाथ था।
क्या माजरा था? देवराज चौहान भी हतप्रभ था। बस केवल एक बात साफ़ थी कि उसने डकैती के लिए जिन लोगों को अपने साथ जोड़ा था उनमे कोई गद्दार था, कोई मुखबिर था जो उनके आपस की बातें दूसरे तक ले जा रहा था। कौन था ये मुखबिर? और ये दूसरा कौन सा व्यक्ति था जिसने देवराज चौहान के जैसे डकैती को अंजाम दिया था। पुलिस ये दावा क्यों कर रही थी कि देवराज चौहान ही डकैती में शामिल था?
क्या देवराज चौहान इन सवालों के जवाब ढूँढ पाया? क्या वो अपने दामन में लगे खून के दाग़ धो पाया?


उपन्यास की अगर बात करूँ तो उपन्यास मुझे पसंद आया। कहानी तेज रफ़्तार थी जिसमे मेरी रूचि अंत तक कायम रही। मुख्यतः ये एक थ्रिलर उपन्यास है। इसमें रहस्य की केवल एक ही बात है कि मुखबिर कौन था? बाकी इसमें पाठक केवल ये देखने के लिए उपन्यास पढता है कि देवराज चौहान किस तरह से अपने पे लगे हुए दाग़ तो मिटाता है। उपन्यास के किरदार की बात करूँ तो किरदार सारे मामूली है जिन्हें एक ही उपन्यास के लिये गढ़ा गया है। 

हाँ,टीनू का इस्तेमाल अनिल जी चाहें तो आगे के उपन्यास मे कर सकते हैं। देवराज चौहान के अलावा उपन्यास के 
मुख्य किरदार निम्न हैं:

जगमोहन और सोहनलाल - देवराज चौहान के साथी जो अक्सर हर उपन्यास में उसके साथ रहते हैं
टीनू - एक स्मैक का नशा करने वाला चोर जिसके पास ऐसी जानकारी लगती है जिसके कारण पहली चोरी का प्लान बनता है 
सुजान सिंह सूरी - एक अपराधी जो बाद में शराब की भट्टी लगाकर शराब का व्यापारी बना और फिर हालात ऐसे हुए कि पैसों की ज़रुरत थी। अब उसे कुछ भी करके पैसे चाहिए थे।
पम्मी - एक कॉल गर्ल। वो अपने बच्चे की खातिर इस धंधे में शामिल हुई थी। पर अब इस धंधे से निकलने और अपने बच्चे के भविष्य के लिए उसे पैसों की सख्त ज़रुरत थी।
विष्णु पांडे- एक मेकैनिक।
इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखड़े - यह इंस्पेक्टर पहले भी देवराज से टकरा चुका था। ये ईमानदार पुलिस वाला था जिसकी देवराज भी इज्जत करता था। लेकिन जब इसे पता चला चोरी के दौरान देवराज ने खून किया तो इसने देवराज को पकड़ने की ठान ली थी।
असलम जाफरी - हरिनगर पुलिस स्टेशन का इंचार्ज जिसके इलाके मे घटना हुई थी।

इनके इलावा भी इक्के दुक्के किरदार और हैं लेकिन उनके नाम उजागर करने से कहानी के सस्पेंस पे असर पड़ सकता है तो बेहतर होगा आप उनके विषय में कहानी पढ़कर ही पता कीजियेगा।

उपन्यास की कमी कि बात करूँ तो इसमें ऐसे मोड़ कम हैं जो आपको हैरान कर देते हो। कहानी लीनियर है लेकिन इसकी गति इस चीज़ की भरपाई कर देती है। इसके अलावा इस उपन्यास में मुम्बई की भाषा देखने को नहीं मिलती इसलिए इसमें वो ऑथेंटिसिटी नहीं आती है जो कि तब आती जब भाषा इस्तेमाल की होती। इसके इलावा इस उपन्यासों के शुरूआती पृष्ठों में कुछ वाक्यों को इस तरह लिखा गया था कि मुझे वो अजीब लगे। 

उदाहरण के लिए:
हाल ये था उसका कि लोग नशा करके नशे में आते हैं और टीनू नशा करके होश में आता था।

जो कि मेरे हिसाब से ऐसे होना चाहिए था:
उसका हाल ये था...

ऐसा वाक्य कई जगह हैं। जो कि खटकते हैं।
 जैसे उसका धंधा चोरी करना था को धंधा उसका चोरी करना था लिखा हुआ है। 

ये वाक्य खटकते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं कि लेखक ने क्या सोचकर इन्हें लिखा होगा। मैं अनिल मोहन के चार उपन्यास तो अभी तक पढ़ चुका हूँ लेकिन ऐसे वाक्य मैने पहलो बार देखे। 

ऊपर लिखी बातों के इलावा उपन्यास में मुझे ज्यादा कोई कमी नहीं लगी। मुझे यह उपन्यास औसत से थोड़ा अच्छा लगा। कहानी ऐसी है जिससे कहीं भी बोरियत नहीं होती इसलिए पाठक उपन्यास पढ़ता चला जाता है।

मेरे हिसाब से उपन्यास को एक बार को पढ़ा जा सकता है।

अगर आपने उपन्यास पढ़ा है तो इसके विषय में आपकी क्या राय है? टिप्पणी बक्से में जरूर दीजियेगा।और अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो आप उसे निम्न  लिंक से मँगवा सकते हैं :

आप अगर ऐसे और कोई उपन्यास साझा करना चाहते हैं तो उनके नाम भी टिप्पणी बक्से में लिखियेगा।
अब इजाजत चाहूँगा।

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