एक बुक जर्नल: चरित्रहीन - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

Friday, March 4, 2016

चरित्रहीन - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

रेटिंग : ४/५
उपन्यास फरबरी ११ से लेकर फरबरी २१ के बीच  पढ़ा  गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ४०८
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन


पहला वाक्य :
पश्चिम के एक बड़े शहर में इस समय ठण्ड पड़ने ही वाली थी। 

चरित्रहीन की  परिभाषा अक्सर  हमारे समाज  ने एक  औरत  के  लिए ही आरक्षित करी होती  है। मर्द इससे कम ही सुशोभित हुआ  करते हैं। शरत बाबू  का  यह उपन्यास  पहली बार १९१७ में  प्रकाशित  हुआ था। उपन्यास  के मुख्य पात्र इस प्रकार हैं : उपेन्द्रनाथ जो कि पेशे से वकील हैं, सतीश उपेन्द्र का दोस्त और जिसे उपेन्द्र अपने  छोटे भाई  के समान समझता है, दिवाकर, उपेन्द्र का ममेरा भाई है जो कि उपेन्द्र के घर  में ही रहता है, किरणमयी, उपेन्द्र के दोस्त हारान की पत्नी , और  सावित्री , सतीश के डेरे में  काम करने  वाली एक युवती जिसके प्रति सतीश  के मन  में  स्नेह है। इन पात्रों के  जीवन  के  इर्द  गिर्द ही उपन्यास की कहानी बुनी  गयी है।
सतीश का पढ़ाई में रुझान  नहीं  है। इसलिए वो कलकत्ता आकर होमियोपैथी के कॉलेज में दाखिला ले लेता है। उसका मन है कि वो होमियोपैथी की शिक्षा ग्रहण करके एक डॉक्टर बन लेगा और अपने गाँव में एक चिकित्सालय खोल देगा। इस सिलसिले में जिस डेरे में वो रहने लगता है वहाँ उसकी मुलाकात सावित्री नाम की स्त्री से होती है। सावित्री बहुत हँस मुख है और  सभी से  हँस हँस कर बात करती है। वो एक विधवा है ये बात सतीश जानता है। वहाँ सतीश का झुकाव उसके प्रति होने लगता है और ये झुकाव सवित्री की तरफ से भी होता है। लेकिन फिर कुछ गलत फहमिया और कुछ घटानाएं ऐसी होती है कि सतीश और सावित्री अलग हो जाते हैं। सतीश सावित्री को चरित्रहीन समझता है और अपने गाँव वापस आ जाता है।
वहीं उपेन्द्र को जब खबर मिलती है कि उसके बचपन के दोस्त हारान की तबियत बहुत खराब है तो वो सतीश को लेकर उसके घर जाता है। हारान बहुत गरीब है जो कि घर की हालत को देखकर साफ़ जाहिर होता है। वहाँ उपेन्द्र और सतीश की मुलाक़ात किरणमयी से होती है। किरणमयी का अभूतपूर्व सौंदर्य से वो प्रभावित होते हैं। और फिर ऐसा कुछ होता है कि किरणमयी उपेन्द्र की तरफ आकर्षित हो जाती है। उपेन्द्र के लिए ये बात चरित्रहीनता की निशानी है। लेकिन फिर भी वो उसे समझा देता है। और उपेन्द्र की पत्नी सुरबाला से मिलने के बाद किरणमयी भी अपने आप को संभाल देती है।
फिर उपेन्द्र दिवाकर को पढने के लिए किरणमयी के पास छोड़कर चला जाता है। और उधर ऐसा कुछ होता है कि उपेन्द्र को शक हो जाता है कि किरणमयी अब दिवाकर के आकर्षित हो गयी है।  इस बात से किरणमयी को पीड़ा पहुँचती है और वो एक ऐसा कदम उठा लेती है कि जिसका पछतावा करने के सिवा और कोई चारा उसके पास नहीं बचता।
क्या हुआ सतीश और सावित्री के बीच ? क्यों किरणमयी के ऊपर उपेन्द्र विशवास न कर सका ? किरणमयी अपने पति के होते हुए क्यों उपेन्द्र की तरफ आकर्षित हुई ? ये बाते तो आप उपन्यास पढ़कर ही जान पायेंगे।

एक हफ्ते से ऊपर गुजर गया है लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस उपन्यास के विषय में क्या लिख़ूँ? शरत जी के उपन्यास मुझे हमेशा से ही अच्छे लगे हैं। उनके उपन्यास अपने वक्त के बंगाली समाज का चित्रण करते हैं। समाज की कुरीतियाँ, अच्छाई सब कुछ इस तरीके से दिखाते हैं कि मेरा विशवास इस बात पर दृढ हो चूका है कि साहित्य न केवल समाज का आइना होता है बल्कि एक समाज का दस्तावेज भी होता है।
चरित्रहीन भी ऐसा ही उपन्यास है। उपन्यास मुझे काफी पसंद आया। इसके मुख्य किरदार तीन आयामी हैं जिनके जीवन के उतार चढ़ाव के साथ साथ उनके व्यवहार में भी परिवर्तन होता रहता है। इसलिए कहीं से भी ये किरदार गढ़े हुए नहीं लगते हैं। हाँ शुरुआत में उपेन्द्रनाथ शुरुआत में कड़े स्वभाव के होते है जो सामाजिक मान्यताओं को अक्षरक्षः पालन करने में विशवास करते हैं, वहीं उपन्यास के अंत तक ऐसी घटनायें होती है जो उनके इस व्यवहार को बदल देती हैं। वो अपने कड़ेपन के कारण जल्दबाजी और गुस्से में कुछ ऐसी गलतियाँ कर देते हैं कि बाद में उन्हें इसके लिए पछताना पड़ता है। उपेन्द्रनाथ जैसे कई लोग होते हैं जो समाज के कानून को पत्थर की लकीर समझ कर उसी के अनुसार इंसान के चरित्र को तोलते हैं। जो उसमे खरा उतरता है उसे अच्छा और जो नहीं उसे चरित्रहीन की संज्ञा देते हैं। उपेन्द्रनाथ तो बदल गये थे लेकिन अक्सर ऐसे लोग कम ही बदलते हैं।
उपन्यास का दूसरा मुख्य किरदार सतीश है। वो पढ़ाई में ठीक नहीं है और इस बात से भली भाँती परिचित है। लेकिन इसकी भरपाई वो अपने हँसमुख चरित्र और अपने व्य्क्वतित्व से कर लेता है। वो हँसमुख है और जो उसे सही लगता है उसके लिए वो खड़ा होता है। उपेन्द्र को अपना बड़ा भाई मानता है और उनकी तरफ उसकी श्रद्धा राम और हनुमान के रिश्ते की याद दिलाती है। सावित्री से उसका प्रेम बहुत पवित्र है। और उपन्यास के अंत तक मैं यही उम्मीद करता रहा कि दोनों एक हो जायें। सतीश एक ऐसा किरदार है जो सामजिक रूढ़ियों के ऊपर ज्यादा विशवास नहीं रखता है। और चूंकि वो पैसे वाला भी है तो वो जानता है कि ऐसी रूढ़ियाँ अमीरों के लिए कभी भी नहीं रही हैं।
उपन्यास में एक किरदार दिवाकर भी है। दिवाकर उपेन्द्र का ममेरा भाई है। वो बचपन से ही उपेन्द्र के घर ही रहा है। वो जानता है कि उपेन्द्र का घर से उसका रिश्ता उसकी सौतेली माँ के कारण ही है और इस बात से उसे ये एहसास है कि वो इस दुनिया में काफी अकेला और उपेन्द्र के परिवार के कर्ज के बोझ के तले दबा हुआ है। हालांकि उपेन्द्र उसे अपना छोटा भाई मानते हैं लेकीन उनके परिवार में सभी दिवाकर से ज्यादा खुश नहीं है। वो एक बच्चा है इसीलिए आसानी से उसे प्रभावित किया जा सकता है। उपन्यास में अक्सर ऐसा ही होता है।
उपन्यास के महिला चरित्र इस तरीके से गढ़े गये हैं जो कि उस वक्त के समाज की औरतों के विषय में काफी कुछ बताता है।
उपेन्द्रनाथ की पत्नी सुरबाला एक दान धर्म को मानने वाली औरत है। वो एक अमीर घराने की है लेकिन आधुनिक शिक्षा का इनता असर उस पर नहीं पड़ा है। वो भोली है और इस कारण उपेन्द्र जो कि पढ़ा लिखा है उससे प्रेम तो करता है लेकिन वो प्रेम एक कर्तव्य के जैसे होता है।
वहीं दूसरी तरफ किरणमयी है। किरणमयी अभूतपूर्व सुंदरी है। उसके पति हारान ने उसे कभी पत्नी का दर्जा दिया ही नहीं। जब से वो अपने पति के यहाँ है उनके बीच में गुरु शिष्या सा सम्बन्ध रहा। हारान के इस व्यवहार का नतीजा ये रहा कि दोनों के बीच में कोई प्रेम ही नहीं उपजा। किरणमयी को उपन्यास में तो चरित्रहीन का तमगा मिला था लेकिन मेरी नज़र में वो सबसे बदकिस्मत और दयनीय किरदार था। उसे प्रेम नहीं मिला और उसी चाह में जो उसके साथ होता उसने मुझे दुखी किया।
सावित्री का किरदार उपन्यास की सबसे सशक्त महिला किरदार है। लेकिन वो भी बेड़ियों से बंधी हुई है। ये बेड़ियाँ है उसके अपने संस्कार की। वो समाज को जानती है और यथार्थवादी है।पूरे उपन्यास में उसके यह नजरिया दिखता है।
सावित्री उपेन्द्रनाथ के दोस्त की बहन है। वो एक आधुनिक महिला है जिसने अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण की है और उसका व्यवहार भी उसी के हिसाब से है। न वो जात पात पर विशवास रखती है और न ही धार्मिक ढकोसलों में ही उसका विश्वास है। इस बात को लेकर उसकी माँ और उसके बीच एक द्वन्द की स्थिति ही रहती है।
उपन्यास में किरदारों के इलावा जो बात नोट करने योग्य है वो उनका समाज है जिसमे ये किरदार रहते हैं। वहां की सामजिक स्थिति का अंदाज  आप उपन्यास से लिए गये निम्न अंशों से ही लगा सकते हैं:
सवित्री कमरे में आकर खिडकियों को बंद करने लगी। सतीश एकाएक उसकी ओर देखता रहा। देखते-देखते अचानक कृतज्ञता से उसका हृदय भर गया। प्यार से बोला-'अच्छा सावित्री! तुम अपने आप को नीच स्त्री क्यों कहती हो?'
सावित्री मुड़कर खड़ी हो गई और बोली-"तो सच्ची बात नहीं कहूँगी?"
सतीश ने कहा - "यह तो हरगिज सच नहीं है। तू, गंगाजी में गर्दन भर पानी में खड़ी होकर कहोगी तब भी मैं विशवास नहीं करूँगा।"
सावित्री ने मंद मंद मुस्कुराकर कहा -"क्यों नहीं करेंगे विश्वास?"
सतीश - "यह तो मैं हरगिज नहीं जानता। शायद इसलिए कि यह सच नहीं है। न तो नीचो के समान तुम्हारा व्यवहार है, न वैसी बातचीत और न ही वैसी शक्ल सूरत है.... हाँ, तुमने इतना पढना लिखना कहाँ सीखा?"
यहाँ 'नीच' छोटी जाति के लिए प्रयुक्त किया हुआ है।
"कैसे क्या? तुम जब जब यह बात कहा करते हो;लेकिन तुम पिताजी के रुपए देखकर नहीं गए थे। पिताजी के पास रुपए होते या न होते,तुम्हे जाना ही पड़ता। मैं जहाँ,जिस घर में जन्म लेती! वहाँ तुम्हें जरूर जाना पड़ता-समझते हो?"
उपेन्द्र ने गंभीरता का ढोंग रचकर कहा - "हाँ, समझ पाटा हूँ। लेकिन मान लो,यदि तुमने कायस्थ के घर जन्म लिया होता तो?"
सुरबाला खिलखिलाकर हँस पड़ी , बोली -"वाह ! क्या खूब! कहीं ब्राहमण के घर की लड़की कायस्थ के घर जन्म लेती है! इसी बुद्धि के बल पर वकालत करते हो।"
सुरबाला इस उपन्यास की सबसे मृदुभाषी चरित्रों में से एक है। वो दयालु है, धर्मभीरु है लेकिन फिर भी जातिवादी है। ये जातिवाद इसलिए उसके अन्दर है क्योंकि बचपन से ही उसने ऐसा देखा है। और वो इसी समाज को जानती है। ऐसे ही अन्य चरित्र इस उपन्यास में हैं जो वैसे तो पढ़े लिखे हैं लेकिन जाने अनजाने में जाती प्रथा का पालन करते हैं। उपन्यास पढता हूँ तो लगता है कि आज के समाज में भी ये बात प्रासंगिक है। भले ही उस वक्त के हिसाब से काफी बदलाव आया है लेकिन फिर भी कई जगह चीज़ें बहुत हद तक ऐसी ही हैं जैसा इस उपन्यास में दिखता है। उपन्यास में न केवल कहानी पढने योग्य बल्कि उसके इलावा उस वक्त के समाज का ये ब्यौरा देखने योग्य है। उपन्यास आज से १०० साल पहले प्रकाशित हुआ था और अगर हम १०० साल बाद भी ऐसे ही जातिवाद से जूझ रहे हैं तो हमे सचमुच ये सोचना पड़ेगा कि हमने कितना विकास किया है।
उपन्यास मुझे काफी पसंद आया।और मैं चाहूँगा आपको भी इस उपन्यास को पढना चाहिए। साहित्य अपने वक्त के सामज का आईना होता है। और इस उपन्यास को आप अगर पढ़े तो शायद उस वक्त के प्रतिबिम्ब के इलावा आज के समाज का प्रतिबिम्ब भी आपको देखने को मिले।
अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आपको ये उपन्यास कैसा लगा? अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो आप इस उपन्यास आप निम्न लिंक  से प्राप्त कर सकते हैं :
अमेज़न

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