Thursday, August 27, 2015

वो कौन थी - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : २/५
उपन्यास २२ अगस्त से अगस्त २८ के बीच पढ़ी गयी

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : ईबुक
प्रकाशक : न्यूज़ हंट
प्रथम प्रकाशन : १९८५




पहला वाक्य:
"नीना, अभी भी अपना फैसला बदल ले। "

दिल्ली शहर का  अगर आप अखबार उठाएंगे  तो ऐसा मुश्किल ही है की आपको उसमे किसी क़त्ल की वारदात का ज़िक्र न मिले।  अक्सर ये केस  सुलझ जाते हैं लेकिन कई बार इन केसेस में पुलिस को कामयाबी हासिल नहीं होती है।  ऐसी ही कुछ घटनायें दिल्ली शहर में हो रही थी। चार खून हुए और चारो ऐसे व्यक्तियों के हुए जिनके बीच में कोई सम्बन्ध स्थापित करना मुश्किल था। चारों की मौत अलग अलग तरह से हुई थी। इनमे कुछ समानता थी तो बस ये की अभी लाशों के पास एक दो गज लम्बाई का काले रंग का लट्ठे का टुकड़ा पाया गया था। और इन सभी के इर्द गिर्द मौत के पहले एक रहस्यमयी लड़की देखी गयी थी जिसका रंग रूप सभी मामलों में भिन्न था। पुलिस वाले इन सभी मौतों को अलग अलग केस मान रहे थे लेकिन सब इंस्पेक्टर महेश्वरी इन कत्लों को एक ही गुनाहगार की हरकत मानता था।

कौन थी ये रहस्यमयी लड़कियाँ? क्या ये एक ही लड़की के रूप थे? आखिर क्यों हो रहे थे ये क़त्ल? और अभी कितने क़त्ल होने बाकी थे ? क्या महेश्वरी कत्लों का ये सिलसिला रोकने में सफल होगा? ऐसे कई सवाल है लेकिन इनके जवाब आपको इस उपन्यास को पढने के पश्चात ही ज्ञात होंगे।  



'वो कौन थी' सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का थ्रिलर है जो पहली बार १९८५ में आया था और अब न्यूज़ हंट के माध्यम से पुनः प्रकाशित हुआ है। अब अगर उपन्यास की बात करूँ तो उपन्यास मुझे औसत लगा। उपन्यास  थ्रिलर  श्रेणी का था लेकिन जो पैमाने एक थ्रिलर उपन्यास को अच्छा उपन्यास बनाते है (रोमांच और रहस्य ) वो मुझे इसमें नहीं दिखे।
इस उपन्यास में पाठक को शुरू में ही पता चल जाता है कि कौन कातिल है लेकिन फिर क़त्ल क्यों हो रहे हैं इसी बात  को जानने के लिए पाठक  उपन्यास अंत तक पढ़ता है । यह एक सीधी खानी है, क़त्ल होते हैं और कत्ल के तरीके भी कोई इतने ख़ास नहीं होते हैं। इसलिए इसमें न इतना बड़ा रहस्य ही है कि कातिल कौन है और न रोमांच ही इतना ज्यादा है।
दूसरे किरदार भी ऐसे नहीं थे की आप उनसे कोई जुड़ाव महसूस करें।  हाँ, अंत में थोडा घुमाव कहानी को दिया गया था जिसको पढने में आनंद आया। मुझे ऐसे लगा की कहानी जल्दबाजी में लिखी गई है।
अंत में केवल इतना कहूँगा की यह उपन्यास मुझे पाठक जी के जितने उपन्यास मैंने पढ़े हैं उनमे सबसे कमजोर लगा।  अगर पहली बार पाठक जी का उपन्यास पढ़ रहे हैं तो इससे दूर ही रहिएगा। अगर आप पाठक सर के फेन हैं तो एक बार ये उपन्यास पढ़ा जा सकता है।
उपन्यास आपको निम्न लिंक पर प्राप्त हो सकता है जिसे आप डेली हंट ( न्यूज़ हंट) के माध्यम से पढ़ सकते हैं:
न्यूज़ हंट  

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