एक बुक जर्नल: एक मुट्ठी दर्द - वेद प्रकाश शर्मा और हत्यारा फूल - मनीष गुप्ता

Wednesday, August 12, 2015

एक मुट्ठी दर्द - वेद प्रकाश शर्मा और हत्यारा फूल - मनीष गुप्ता

रेटिंग : २/५
उपन्यास २० जुलाई २०१५ से २१ जुलाई २०१५ के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या :
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स





इस पुस्तक में वेद प्रकाश शर्मा जी का उपन्यास एक मुट्ठी दर्द के इलावा मनीष गुप्ता जी का लघु उपन्यास हत्यारा फूल भी था। इस बात का उपन्यास के शुरुआत में कोई जिक्र नहीं था और मेरे लिए कुछ अप्रत्याशित सा था। मैं अपने इस पोस्ट में दोनों कृतियों के विषय में ही लिखूँगा।

एक मुट्ठी दर्द  १.५/५

पहला वाक्य :
नहीं... नहीं... तुम मेरे भाई नहीं हो सकते...तुम खूनी हो... हत्यारे...पापी, तुमने बहन कि ममांग का सिन्दूर उजाड़ा है, तुमने अपने बहन के पति कि हत्या की है। 


प्रकाश अपनी ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा मुहब्बत अगर करता था तो केवल दो शख्सों  से - पहली उसकी छोटी बहिन कुसुम और दूसरा उसका दोस्त मिलाप।  वो इनके लिए अपनी जान भी दे सकता था और जुर्म भी कर सकता था। तो फिर क्यों वो जेल में था ? उसके ऊपर आरोप था कि उसने अपनी बहन के पति कि हत्या की थी और अपने दोस्त से विश्वासघात किया था। ऐसा क्या हो गया था कि उसने उन लोगों को दुःख पहुँचाया जिनके जीवन में वो केवल खुशियाँ भरना चाहता था।  

वेद प्रकाश शर्मा का लिखा हुआ उपन्यास एक मुट्ठी दर्द की विषय वस्तु तो अच्छी थी लेकिन उपन्यास ने निराश किया। कुबड़ा के बाद वेद प्रकाश शर्मा का ये दूसरा उपन्यास मैंने पढ़ा है। और तीसरा पढूँगा इसकी कोई उम्मीद नहीं है। उपन्यास एक छोटे से कस्बे चाँदपुर में बसा हुआ है और इसकी काफी कहानी हमे फ़्लैश बेक के माध्यम से पता चलती है।

उपन्यास की विषय वस्तु दहेज़ प्रथा है और कैसे ये प्रथा कई जिंदगियों को बर्बाद कर देती है। उपन्यास काफी अच्छा बन सकता था लेकिन इसमें इतने प्लाट होल्स हैं कि ये पढ़ते समय पूरा मज़ा किरकिरा कर देता है। किरदार इस तरीके से व्यव्हार करते हैं कि कोई भी उस परिस्थिति में उस तरीके से व्यवहार करेगा और दुःख तो इस बात का है की इसी व्यवहार के कारण कहानी का भी वजूद है।

नीचे जो मुख्यतः बाते मुझे खली मैं उनका ज़िक्र करूंगा लेकिन उससे कहानी उजागर होने का खतरा है इसलिए अगर आप इस उपन्यास को पढना चाहते हैं (जिसकी सलाह मैं नहीं दूँगा) तो आप नीचे नहीं पढ़िएगा :

कहानी में प्रकाश, कुसुम और मिलाप तीन मुख्य पात्र हैं। मिलाप अमीर घर से है लेकिन फिर भी इनकी दोस्ती मशहूर है। यही नहीं प्रकाश के घर वाले भी मिलाप से अत्यधिक स्नेह करते थे। ऐसे में अगर मिलाप को कुछ हो जाये तो उनका मिलाप का ख्याल रखना लाजमी था। लेकिन ऐसा होता है नहीं। जब प्रकाश रिहा होता है तो कुसुम उसे ताने देती है कि उसने अपने दोस्त को धोखा दिया।

"क्षमा ....!" कुसुम अत्यधिक क्रोध में दांत पीसकर बोली - 'अपने पति के हत्यारे को क्षमा कर दूँ? एक ऐसे नीच को क्षमा कर दूँ जिसने उस दोस्त को भी धोखा दिया जिसने तुम्हारी बहन की शादी अपने पैसो से की।'

उसका गुस्सा लाज़मी लगता है लेकिन उपन्यास पढ़ते वक़्त जो बाते पता चलती हैं उसको ध्यान में रखकर ये गुस्सा लाजमी नहीं लगता है। कुसुम के पति ने उसको जिंदा जलाने की कोशिश की थी और ऐसे हैवान को अगर प्रकाश ने मार भी दिया तो कुसुम को गुस्सा क्यों आया ये बात मेरी पल्ले नहीं पड़ती है। उसे तो अपने भाई को और प्यार करना चाहिए था।

दूसरी बात वो अपने भाई को उस दोस्त को धोखा देने का मारती है लेकिन वो उस दोस्त की मदद खुद नहीं करती है। मिलाप पागल हो चुका था और अपनी खंडहर हो चुकी हवेली में अकेला रहने लग गया था। कुसुम की माली हालत भी अच्छी थी और शुरुआत में उपन्यास में दिखाते भी है की कुसुम ने मिलाप को एक बड़ा भाई ही माना था तो ऐसे में अपने भाई को ताने देना और खुद पागल हो चुके मिलाप की मदद न करना मुझे जमा नहीं। कुसुम एक दयावान लड़की है।

 ' बाबा ।' एकाएक उसकी बहन की मधुवाणी के माध्यम से माने उसके कानों में कोई शहद उड़ेल रहा हो -'आपको शायद सर्दी लग रही है। लीजिये ये कम्बल ले लीजिये।'
 इस आवाज के साथ ही एक मोटे, गर्म, ऊनी और लम्बे कम्बल ने उसका सारा जिस्म ढांप लिया।

वो जब प्रकाश को भिखारी समझती है तो उसे कम्बल लाकर देती है लेकिन मिलाप के प्रति ये बेरूखी उसके चरित्र के अनुरूप नहीं थी।

आखरी में मिलाप अपना सर पटक पटक के जान दे देता है लेकिन प्रकाश उसको रोकने नहीं जाता। प्रकाश जो मिलाप पे जान भी लुटा सकता था। ये बात भी प्रकाश के चरित्र के अनुरूप नहीं थी और मुझे ये हजम नही हुआ। हम जब भी किसी को अपने आप को क्षति पहुँचाते देखते हैं तो हमारा पहला काम उसको ऐसा करने से रोकना होता है। अनायास ही हम उसको रोकने लगते है लेकीन प्रकाश ऐसा नहीं करता। क्यों नहीं करता भगवान जाने।
मिलाप के पागलपन का ये दौरा बढ़ता ही गया। वह और अधिक जोर-जोर से अपना सर समाधी पर पटकने लगा। सारी समाधी पर गाढ़ा और लाल खून बहने लगा। 
फट .. उफ़ ..घृणा से प्रकाश की आँखे भिंच गई। ह्रदय जैसे उछलकर कंठ में अटक गया। अन्दर से जैसे एक उबकाई सी उठी। वह देखता ही रह गया। कितना घृणित दृश्य, मौत? उफ़.. बड़े बड़े हिंसक पशु भी दहल उठे।

 उपन्यास का अंत भी ऐसा है जिसका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। भाई की मौत का सदमा ऐसा कुसुम को लगता है कि वो वहीं अस्पताल में मर जाती है और वो भी बैठे बैठे। ये तो हास्यादपद बात है। उपन्यास माना कल्पना की उपज होता है लेकिन एक पाठक के तौर पर हम फिर भी उम्मीद करते हैं की लेखनी ऐसी हो की पाठक यथार्थ और कल्पना के बीच का फर्क भूल जाए।  ये बात सामजिक उपन्यासों में ज्यादा लागू होती है।  मार धाड़ वाले उपन्यासों में तो फिर भी थोडा ढील देते ही हैं।  ये उपन्यास इसी कारण से मेरी नज़रों में विफल हुआ।  उपन्यास से मुझे निराशा हुई और पढने में वक़्त और समय की बर्बादी लगी।

अंत में केवल इतना कहूँगा की इस उपन्यास को अगर आप नहीं भी पढेंगे तो किसी अच्छी चीज़ से महरूम नहीं होंगे। इस उपन्यास को मैं तो किसी को पढने के लिए नहीं बोलूँगा।



हत्यारा फूल - मनीष गुप्ता  २.५/५


पहला वाक्य :
ब्लैक आउट !

ब्लैक आउट नामक एक समाचारपत्र सनसनीखेज समाचारों के लिए प्रसिद्ध था।  अरुण सेठ इसका एक युवा और जोशीला पत्रकार था। इस समाचार पत्र का मालिक कस्तूरी लाल भाटिया था जो कि ऐसी सनसनीखेज ख़बरों को ढूँढने का हुनर रखता था।  एक ऐसी ही खबर उसे मिली थी और अरुण को वो इस काम के लिए नियुक्त करना चाहता था। एक गाँव में कुछ दिनों से लोग गायब हो रहे थे और गाँव वालों को यकीन था कि आदमियों के गायब होने के पीछे भूत प्रेतों का काम था।  कितनी सच्चाई थी उनके इस विश्वास के पीछे ? अरुण तो इसे मात्र एक अंधविश्वास मानता था और इसलिए वो इस खबर कि तह तक जाने के लिए तैयार हो गया। तो क्या अरुण पता लगा पाया उन रहस्यमयी तरीके से गायब होते ग्रामीणों का ? क्या सचमुच इसके पीछे कोई अतृप्तआत्मा थी? ये जानने के लिए तो आपको ये उपन्यास ही पढना पड़ेगा।
उपन्यास पठनीय है और कथानक ऐसा है की जिसको पढने के लिए पाठक में रूचि जागती है। उपन्यास में मुझे निम्न बाते थोडा से खली :
उपन्यास में अरुण सेठ का पूरा नाम ही प्रयुक्त किया गया जो कुछ समय बाद अटपटा लगने लगा क्यूंकि उपन्यास में अरुण नाम का कोई दूसरा किरदार नहीं था और इसलिए पूरे नाम के प्रयोग करने का कोई औचित्य नहीं था।
उपन्यास के अंत में कुछ सम्पादकीय गलती देखी जैसे सब इंस्पेक्टर गौतम किसी राकेश को  फर्स्ट ऐड किट लाने के लिए बोलता है लेकिन कब्रिस्तान केवल गौतम , अरुण और रामदीन ही गये थे।  इसके इलावा तिलकराज खोसला कई बार चार लोगों कि लाश ठिकाने लगाने कि बात करता है जबकि उधर तीन ही लोग थे।

खैर इतना तो मैं कहूँगा कि ये उपन्यास मुझे मुख्य उपन्यास से अच्छा लगा। गाँव में भूत और रहस्योद्घाटन काफी बार कहानियों में प्रयोग किया गया है इसलिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस लघु उपन्यास में इसका ट्रीटमेंट अच्छा है जिसके कारण पाठक की रुचि बनी रहती है।  मेरे हिसाब से तो इस पुस्तक के मुख्य उपन्यास के मुकाबले ये लघु उपन्यास मुझे ज्यादा भाया।  इसको पढ़कर ऐसा लगा की इस पुस्तक के लिए पैसे बर्बाद नहीं किये।

5 comments:

  1. अच्छी समीक्षा ।

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    1. शुक्रिया, शम्भू जी। ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आते रहा करिएगा।

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  2. उपन्यास पढ़ने का कोई तरीका बताएं

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    1. उपन्यास खरीद कर पढ़ें। यह उपन्यास rajcomics.com से मैंने ख़रीदा था। उपन्यास खरीद कर ही पढ़े जाने चाहिये। इससे लेखको को अच्छे उपन्यास लिखते जाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

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  3. उपन्यास पढ़ने का कोई तरीका बताएं

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