मकड़जाल - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ३.५/५
उपन्यास ०१ मई से ०३ मई के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : ३६८
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स


पहला वाक्य :
डॉक्टर प्रफुल सिंगला बतौर डॉक्टर अपने कारोबार में कहाँ ठहरता था, ये बहस का मुद्दा हो सकता था लेकिन इस बारे में कोई दो राय मुमकिन नहीं थी कि उसके बनाने वाले ने उसे ऐसी शक्ल सूरत से नवाज़ा था कि वो किसी भी ऐसे फिल्म स्टार के मन में हीन भावना पैदा कर सकता था जिसकी वाहिद खूबी उसकी शक्ल सूरत थी।


प्रफुल सिंगला पेशे से डॉक्टर था लेकिन उसकी कमाई उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं था । वो जैसी ऐशो आराम कि ज़िन्दगी का ख्वाब देखा करता था उसको हकीकत में तब्दील करने लायक पैसे उसकी क्लिनिक से तो नहीं आने वाले थे। इसके इलावा उसे अपने पिता के कर्जे को भी चुकाना थी जो कि उसे मुश्किल जान पड़ता था। हालत ऐसी थी कि उसके पास जो रही सही संपत्ति थी वो भी हाथ से जाती हुई दिख रही थी। वो अपनी ज़िन्दगी से मायूस था जब कपिल कोठारी उसे मिला। कपिल के मिलने के बाद उसके क्लिनिक में मरीजो कि संख्या में भारी इजाफा होने लगा। और ऐसे ही एक मरीज था सदानंद पुणेकर। सदानंद पुणेकर को वो एक बड़ा व्यापारी समझता था लेकिन जब उसकी असलियत का पता सिंगला को चला तो सिंगला को अपने पैरों तले जमीन निकलती महसूस हुई। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और सिंगला पुणेकर कि हाथों कि कठपुतली बन चुका था। हाँ, वो बात दूसरी थी कि वो पुणेकर कि नौजवान परिचेहरा बीवी नमिता कि आशकी में भी गिरफ्त हो चुका था। क्या हुआ डॉक्टर सिंगला का अंजाम? क्या वो इस मकड़जाल से निकलने में कामयाब हुआ? क्या नमिता से इश्क कि बात का इल्म पुणेकर को हुआ? अगर हुआ तो पुणेकर ने क्या किया?क्या नमिता भी सिंगला से प्रेम करती थी? ऐसे ही सवाल आपके मन में उठ रहे होंगे। इन सवालों के जवाब तो आपको उपन्यास को पढ़ने के बाद ही मिल पायेंगे।



मैंने पाठक साहब को पढना हाल ही मैं शुरू किया है। वो अब तक ३०० से उपन्यास लिख चुकें हैं और मैंने बमुश्किल १० उपन्यास भी नहीं पढ़े होंगे। लेकिन फिर मैं अपने आपको उनकी लेखनी का दीवाना मानता हूँ। और उम्मीद करता हूँ इस साल उनके अधिकतम उपन्यासों को एक बार तो पढ़ ही चुका होंगा। मकड़जाल पाठक जी का थ्रिलर उपन्यास है। उपन्यास कि शुरुआत मुझे अच्छी लगी। उपन्यास तेज गति से भागता है और फिर मध्य में आकर इसकी गति थोडा थम जाती है। नमिता और सिंगला के बीच में अफेयर के दौरान जो घटनाक्रम होता है वो मुझे थोड़ा बोरिंग लगा। मैं जब उपन्यास पढ़ता हूँ खासकर एक थ्रिलर (रोमांचकारी) उपन्यास तो मुझे ऐसा कथानक चाहिए होता है जिसमे घटनाक्रम तेजी के साथ घटित होता रहे और पाठक पन्ने को पलटने के लिए तत्पर रहे। लेकिन बीच के पन्नो में ये तेजी मुझे नदारद मिली। इसके बाद उपन्यास फिर तेजी पकड़ता है और अंत तक इस तेजी को बनाये रखता है।

हाँ, उपन्यास की शुरुआत में पाठक जी कहते हैं कि उन्होंने कोशिश कि है कि यह उपन्यास एक एकल उपन्यास कि तरह हो लेकिन मेरे हिसाब से जिस बिंदु पर उपन्यास का अंत होता है उस जगह पर पाठक को लगेगा ही उपन्यास मध्य में ख़त्म कर दिया गया है। मेरे हिसाब से अगर डॉक्टर सिंगला और नमिता के बीच के प्रसंग को थोड़ा काटा होता तो उपन्यास में तेजी बरक़रार रहती और कथानक थोड़ा कसा हुआ होता। अंत को लेकर मुझे कोई गिला नहीं है क्यूँकी अंत ने मुझे इस उपन्यास के अगले हिस्से को पढ़ने के लिए लालायित ही किया। (इस लेख को लिखने तक मैंने इस उपन्यास का दूसरा भाग ग्रांडमास्टर भी पढ़ लिया था और याकिन जानिये जो पिपासा मकड़जाल ने जगाई थी वो ग्रांडमास्टर ने पूरी तरह से बुझाई।)

अंत में इतना ही कहूँगा। उपन्यास मुझे अच्छा लगा और पूरा पैसा वसूल लगा। अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो अपनी राय देना न भूलियेगा और अगर आप इस उपन्यास का आनंद उठाना चाहते हैं तो निम्न लिंक से इस उपन्यास को मंगवाकर पढ़ सकते हैं:
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