Tuesday, May 26, 2015

वो कौन था - अनिल मोहन

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रेटिंग : ३.५/५
२३ मई २०१५ से २४ मई २०१५ के बीच पढ़ा गया

संस्करण विवरण:
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : 319
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स
सीरीज : देवराज चौहान

पहला वाक्य :
सदानंद खोपरे!
मुंबई ही नहीं सारे हिन्दुस्तान का जाना पहचाना नाम था।


देवराज चौहान को अपने पुराने परिचित एक बड़े व्यापारी सदानंद खोपरे के काम के सिलसिले में मलेशिया जाना पड़ा। वो अपने साथ जगमोहन को न ले जा सका क्योंकि जगमोहन को कोई काम था। जब देवराज चौहान वापस आया तो जगमोहन को गुमशुदा  पाया। जब आखरी बार उससे देवराज ने बात की थी तो उसे पता चला था कि जगमोहन किसी कि मदद कर रहा था। जब बहुत कोशिशों के बाद भी जगमोहन नहीं मिला तो देवराज ने सोचा कि उसे पता लगाना है कि जिसकी मदद जगमोहन कर रहा था वो कौन था? अगर देवराज उसका पता लगा लेता है तो शायद जगमोहन भी मिल जाए। लेकिन ये काम जितना मामूली लग रहा था उतना नहीं निकला। देवराज के सामने इस सोच पर काम करते हुए कई मुसीबतें आने लगी। और वो एक ऐसे षड्यंत्र का हिस्सा बनता चला गया जिसमें उसे जान का खतरा होने लगता है। क्या देवराज इस गुत्थी को सुलझा पायेगा कि 'वो कौन था' जिसकी मदद जगमोहन कर रहा था। क्या वो जगमोहन को तलाश कर पायेगा? कौन है जो देवराज के राह में रोड़े अटका रहा है?



कल ही देवराज चौहान सीरीज का उपन्यास 'वो कौन था ' पढ़ा । ये पहली बार है कि देवराज चौहान सीरीज का कोई उपन्यास मैंने पढ़ा है। अनिल मोहन जी का एकल उपन्यास खून की प्यासी पहले पढ़ चुका हूँ। देवराज चौहान के विषय में ज्यादा कुछ तो नहीं जानता लेकिन उपन्यास पढने से पता चला है कि देवराज चौहान डकैती करने में माहिर माना जाता है और इस काम में उसकी तूती बोलती है। हाँ,इस उपन्यास में उसके इसडकैती के जौहर को देखने का मौका पाठक को हासिल नहीं हो पाता है। उपन्यास बेहद रोमांचक था और सीरीज कस होते हुए भीइसको एकल उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है। रोमांचक उपन्यास के बेहतरीन होने कि कसौटी मेरे हिसाब से ये होती है कि वो पाठक को उपन्यास के पन्ने पलटने में मजबूर कर दें और पढ़ते रहने के लिए मजबूर कर दें । इस कसौटी में उपन्यास खरा उतरता है। ऐसा नहीं है कि उपन्यास में इक्का दुक्का कमी नहीं है लेकिन वो उपन्यास के रोमांच को ज्यादा क्षति नहीं पहुँचाती हैं ।

उपन्यास की खूबी उसका घटनाक्रम है जो कहानी के साथ और  भी पेचीदा होता जाता है । जब पाठक को लगता है कि अमुक व्यक्ति देवराज चौहान की मंजिल है तो अचानक से वो तस्वीर से हट जाता है और उसकी जगह कोई और ले लेता है । ऐसे मैं तो कई बार कहने के लिए विवश हो गया की भई 'वो कौन था'। शायद इस विवशता कस सामना आपको भी करना पड़े। यकीन मानिये अगर आपको रहस्य और रोमांच से भरे उपन्यास पसंद है तो ये उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा। अलबत्ता ये आपको इस सीरीज के बाकी उपन्यासों के तरफ मुखातिब होने के लिए प्रोत्साहित ही करेगा जैसे कि मुझे किया।
देवराज चौहान मुख्य चरित्र के रूप में मुझे काफी पसंद आया है। वो एक नो-नॉनसेंस बंदा है । वो इस पेशे से इतने दिनों से जुड़ा हुआ है कि मौके कि नजाकत देखते हुए किसी को भी मारने में हिचकिचाता नहीं है । उसे पता है कि इसका मरना ज़रूरी है तो  वो उसे बिना हिचके मार देता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो सही और गलत को नहीं देखता है। दूसरी बात जो मुझे उसमे पसंद आई कि लेखक ने उसे एक सुपर ह्यूमन के रूप में नहीं  दिखाया है । वो कथानक के दौरान कई बार शिख्स्त हासिल करता है और कई बार गंभीर रूप से घायल भी होता है लेकिन अपने मकसद से हटता नहीं है। अगर लेखक ने देवराज को एक महामानव की तरह दिखाया होता तो निसंदेह उपन्यास का कथानक इतना रोचक न लगता।
ये तो हुई उपन्यास के विषय में वो बाते जो मुझे पसंद आयीं ।ऊपर मैंने उपन्यास में कुछ कमी होने का उल्लेख किया था तो मेरे हिसाब से ये उपन्यास की कमिया  थी।
गुल्ली बाबा को जब देवराज चौहान ने फोन से तसवीरें लेते देख लिया था तो उसने इस हरकत के विषय में उससे क्यों नहीं पूछा।
हर वक़्त उपन्यास के शीर्षक का दोहराव ज्यादा अच्छा नहीं था। इससे पाठक उकता जाता है।
इनके इलावा एक कमी जो मुझे लगी वो भाषा की  लगी । उपन्यास मुंबई में बसाया गया है और यहाँ रहते हुए मैं इधर के लोगों कि हिंदी से वकिफ हूँ। इस उपन्यास में जब पात्र आपस में बातचीत करते हैं तो उनके बात करने का लहजा इतना मुम्बईया नहीं लगता है । अगर ऐसा होता तो उपन्यास के पात्र असलियत के काफी नज़दीक लगते।

अगर आपको रोमांचक उपन्यास पढने का शौक है तो मेरे विचार से ये उपन्यास आपको कतई निराश नहीं करेगा।अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो इसके विषय में अपनी राय देना न भूलियेगा।अगर आप इस सीरीज के नियमित पाठक हैं तो सीरीज के बेहतरीन उपन्यासों के नाम ज़रूर साझा करियेगा ।

उपन्यास को आप निम्न लिंक से मँगवा सकते हैं  :

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