सीक्रेट एजेंट - सुरेन्द्र मोहन पाठक

रेटिंग : ३/५
दिनांक जिसके बीच में उपन्यास पढ़ा गया : ३ अप्रैल २०१५ से ६ अप्रैल २०१५

संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ठ संख्या : २९२
प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स
सीरीज : नीलेश गोखले #२


पहला वाक्य :
सुबह ग्यारह बजे का वक़्त था जबकि मुंबई पुलिस हेडक्वाटर्स कि तीसरी मंजिल के एक मिनी कांफ्रेंस रूम जैसे कमरे में एक मिनी कांफ्रेंस ही जारी थी।

सीक्रेट एजेंट सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यासों में ६० वाँ और वैसे प्रकाशित उपन्यासों में २८५ वा है। यह उपन्यास नीलेश गोखले सीरीज का दूसरा उपन्यास है। इस सीरीज का पहला उपन्यास गवाही था जिसके विषय में आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
गवाही
अगर आपने गवाही नहीं पढ़ा तो भी कोई फ़िक्र की बात नहीं है । इस उपन्यास को एक एकल उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है। नीलेश कभी अपराधिक तत्वों के साथ मिलकर इस भ्रष्टाचारी सिस्टम का हिस्सा हुआ करता था। इस बात से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो नामी अपराधियों के तलवे चाटा करता था। लेकिन फिर उसके जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि वो उन्ही लोगों के ऊपर टूट पड़ा जिनका कि वो अब तक साथ देता था। इससे उन सामजिक तत्वों का अंत तो हुआ ही लेकिन इसका एक परिणाम ये भी था कि नीलेश अब मुंबई पुलिस में कार्यरत नहीं था। वो अब एक बार में एक मामूली बाउंसर की नौकरी बजा रहा था। अपनी इस ज़िन्दगी ने एक अवसाद में उसे डाल दिया था। ऐसे में जब मुंबई पुलिस के अफसरों कि तरफ से उसे एक काम मिला और इस काम के बदले में उसे उसकी नौकरी में फिर से बहाली कि उम्मीद दिखी तो न नहीं कर पाया। ये काम काफी खतरनाक था और इसमें से बचकर निकलने का संयोग काफी कम था। तो क्या था ये काम? किधर जाना था नीलेश को सीक्रेट एजेंट बनकर? क्या वो कामयाब हो पाया ? जानने के लिए आपको इस उपन्यास को पढ़ना होगा।



सीक्रेट एजेंट पढ़े हुए अब एक महिना होने को आया लेकिन इसके विषय में लिखने का वक़्त ही अब मिल पाया है। इस बीच ऐसा नहीं है कि मैंने कुछ पढ़ा ही नहीं है, पढ़ना बिना रुके जारी है बस उसके विषय में लिख नहीं पाया। खैर, अभी बात करतें हैं उपन्यास के विषय में। सीक्रेट एजेंट एक पठनीय उपन्यास है। लेकिन इसमें मुझे गवाही से थोड़ा कम रोमांच लगा। इसमें नीलेश को पहले गुपचुप तरीके से कार्यवाही करनी होती है इसलिए वो कभी भी उपन्यास के खलनायक के सामने खुलकर नहीं आता है। फिर उसकी दोस्त का क़त्ल हो जाता है जो कि पाठक को पता होता है किसने किया लेकिन नीलेश को इसकी जानकारी नही होती है। इससे थोड़ा थ्रिल कम हुआ। मेरी राय में अगर पाठक को भी इस जानकारी से महरूम रखा जाता और फिर नीलेश के माध्यम से ये गुत्थी सुलझती तो बेहतर होता। इसके इलावा मेरी शिकायत ये भी रही कि जैसे ही उपन्यास में एक्शन आना शुरू हुआ वैसे ही तूफ़ान ने आकर सारा मज़ा किरकिरा कर दिया।  कोनकोना जजीरे में तूफ़ान आने से नीलेश और जजीरे कि त्रिमूर्ति ट्रिपल ऍम का सामना आनन फानन में हुआ जिसने कि उपन्यास के कथानक से वो थ्रिल ख़त्म कर दिया जो कि उपन्यास में तब होता जब नीलेश सारे सबूत जुटाकर उन तीनों को धर दबोचता और अंत में जब नीलेश और उपन्यास के मुख्य खलनायक अनिल महाबोले का टकराव हुआ तो वो भी इतना ख़ास नहीं लगा। कुल मिलाकर कहूँ तो ये उपन्यास और बेहतर बन सकता था लेकिन बना नहीं। एक औसत उपन्यास जिसकी कहानी बेहतर हो सकती थी। हाँ, पाठक जी कि लेखनी अभी भी बेमिसाल है और वो पाठक को उपन्यास से  बाँधे रखती है।
अगर मैं सलाह दूंगा तो ये ही कहूँगा कि इस उपन्यास को पाठक साहब के अंदाज ए बयाँ के लिए पढ़ा जाना चाहिए।
उपन्यास को आप निम्न लिंक के माध्यम से मंगवा सकते हैं :

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