प्यासी आत्मा - राजभारती

उपन्यास ख़त्म करने की दिनांक - अक्टूबर ,४ ,२०१४
रेटिंग - ३/५



संस्करण विवरण :
फॉर्मेट : पेपरबैक
पृष्ट संख्या :३९७
प्रकाशक : रवि पॉकेट बुक्स

प्रथम वाक्य :
मेरी साँस थोड़ी देर में ही फूलने लगी थी, धूल की तपिश इतनी तेज थी कि मेरा पूरा जिस्म दहकने लगा था और दोनों पांव के जूतों में  अंगारों की तरह जल रहे थे।


'प्यासी आत्मा' राजभारती द्वारा लिखा गया उपन्यास है। हालांकि  ये उपन्यास ममी की अगली कड़ी है लेकिन इसे अपने आप में एक सम्पूर्ण उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है।इस उपन्यास  के दो मुख्य पात्र हैं-अमन राज  उर्फ़ राजू और मधु कांबले।अमन राज एक कंप्यूटर फैक्ट्री  में कार्यरत था जब हालात ने उसे अमीन सोसाइटी के समक्ष लाके खड़ा कर दिया था। उपन्यास की शुरुआत होती है अमन राज  के अमीन सोसाइटी के लोगों से बच कर भागते हुए।वहीं दूसरी पात्र मधु कांबले है जिसे अपने इकीसवें जन्मदिवस पर पता चलता है कि असल में वो मधु कांबले नहीं बल्कि फ्रांसिस खानदान की एकलौती वारिस मोएरा फ्रांसिस है। इस राज के साथ उसे पता चलता है कि उसके चाचा एंड्रू उससे मिलना  चाहते हैं ताकि वो उसे उसकी जायदाद सोंप सकें।एंड्रू उसे मिलने के लिए मिस्र बुलाता है, और मोएरा मिस्र के लिए निकल पड़ती है।  लेकिन उसे पता नहीं है कि उसकी शान्त ज़िन्दगी अब तब्दील होने वाली है। एंड्रू ने मोएरा को मिस्र क्यों बुलाया ?राजू क्यों भाग रहा था और अमीन सोसाइटी के लोग उससे क्या चाहते थे ? और ये आत्मा कौन है जो साढ़े तीन हज़ार वर्षों से अपने प्यार को पाने  के लिए तड़प रही है ? और राजू और मधु की कहानी में क्या सम्बन्ध है ?ऐसे कई सवाल हैं जो आपके मन में उठ रहे होंगे लेकिन  आपको इनका जवाब इस उपन्यास को पढ़ने के बाद ही मिलेगा।

प्यासी आत्मा एक रोचक उपन्यास है जिसमे रोमांच की कमी नहीं है।मुझे उपन्यास पढ़ने में मज़ा आया और कहीं भी बोरियत का एहसास नहीं हुआ।उपन्यास के घटनाक्रम को हम राजू और मधु के नजरिये से देखते हैं।  लेकिन हमें उन दोनों के अनदाजेबयां में कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता। इसमें  कोई शक नहीं की उपन्यास बहुत रोचक है लेकिन दोनों मुख्य पात्र भारत के अलग अलग हिस्सों में पले बड़े थे(राजू -पंजाब में और मधु -महाराष्ट्र के एक कसबे में ) और उनकी भाषा शैली में फ़र्क़ होना लाजमी था।अगर ये फ़र्क़ उनकी कहानी में दिखता तो उपन्यास पढ़ने में चार चाँद लग जाते।  दूसरी कमी मुझे ये खली की इसमें हॉरर के तत्व कम दिखे। इसे हॉरर उपन्यास नहीं कहा जा सकता क्यूंकि उपन्यास के घटनाक्रम में अलौकिक या रूहानी ताकतों का असर काफी कम था।और एक दो जगह कुछ छपाई में गलती थी, जिसे खामी कहना बाल की खाल निकालना होगा।ये ही कुछ बातें थी जो उपन्यास पढ़ते समय मुझे खटकी, और जो अगर नहीं होती तो उपन्यास को पढ़ने का मज़ा दोगुना हो जाता।

बहरहाल, उपन्यास मुझे पैसा वसूल लगा और अगर आप समय बिताने  के लिए कुछ हल्का फुल्का पढ़ना चाहते हैं तो इसका लुत्फ़ उठा सकते हैं। ये उपन्यास आपको किसी भी रेलवे स्टेशन में मौजूद पत्रिकाओं की दुकान में मिल जाएगा।अगर आपने इस उपन्यास को पढ़ा है तो आप अपनी राय टिप्पणी बॉक्स पे देना न भूलियेगा। और अंत में अगर कोई ऐसा ही या इससे बेहतर हॉरर उपन्यास आपने हिंदी पल्प फिक्शन में पढ़ा हो तो उसे साझा करने  में नहीं हिचकिचाईयेगा।

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2 Comments
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  1. डायन 1 और डायन 2 वेद प्रकाश शर्मा द्वारा लिखा गया हॉरर उपन्यास है। ऐसा उपन्यास मैने आज तक नही पढ़ा था। क्या उपन्यास है रात में तो भूलकर भी न पढ़े।एक ही बार मे पूरा उपन्यास पढ़ जाइएगा।

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    1. उदय जी डायन १ तो पढ़ी है। डायन २ बदकिस्मती से नहीं मिल पायी लेकिन मिलते ही जरूर पढ़ूँगा।
      http://vikasnainwal.blogspot.com/2016/12/Daayan-Ved-Prakash-Sharma.html

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